शहरों को ठंडा रखने के लिए जरूरी हैं पेड़, पर अब इन्हें भी चाहिए मदद
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और सूखे की वजह से शहरों के पेड़ खतरे में पड़ गए हैं.
रिकॉर्ड तोड़ गर्मी और सूखे की वजह से शहरों के पेड़ खतरे में पड़ गए हैं. पर्यावरण की इस बड़ी ताकत को कैसे सुरक्षित रखा जाए और कैसे ऐसे शहरी जंगल लगाए जाएं, जो भविष्य में मौसम से जुड़ी चुनौतियों का सामना कर सकें.इस बार रिकॉर्ड तोड़ चिलचिलाती गर्मी में पेड़ों की छांव में चलते समय कभी-कभी ऐसा लगता था मानो वक्त से पहले ही पतझड़ आ गया हो. पैरों के नीचे सूखे और बेजान पत्ते चरमरा रहे थे और पेड़ों की ऊपर की टहनियां या तो पीली पड़ चुकी थीं या फिर पूरी तरह से खाली हो गई थीं.
यह एक बड़ी समस्या है, क्योंकि बड़े और घने पेड़ हमारे शहरों को रहने लायक बनाने में मदद करते हैं. वे धूप को रोकते हैं, प्रदूषण कम करते हैं, कार्बन डायऑक्साइड सोखते हैं, जीव-जंतुओं को पनपने की जगह देते हैं, तेज बारिश के पानी को सोखते हैं और यहां तक कि लोगों की मानसिक और शारीरिक सेहत को भी बेहतर बनाते हैं.
हर तीन में से एक पेड़ पर मंडरा रहा है खतरा
अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में अर्बन हॉर्टिकल्चर इंस्टीट्यूट चलाने वाली नीना बासुक ने डीडब्ल्यू को बताया, "जब पेड़ खत्म हो जाते हैं, तो ये चीजें भी खत्म हो जाती हैं.”
यही वजह है कि शहर और वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इन पेड़ों को कैसे बचाया जाए और भविष्य के लिए बेहतर पेड़ कैसे चुने जाएं.
शहरों में पेड़ों की जरूरत क्यों है?
इंसानों ने उद्योग चलाने और घरों को गर्म रखने के लिए जीवाश्म ईंधन जलाये हैं, जिससे धरती गर्म हो गई है. जलवायु परिवर्तन तेजी से हो रहा है. ऐसे में शहरी पेड़ों की भूमिका और भी अहम हो गई है.
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आखिर ऐसा क्यों है? इसकी वजह यह है कि ये पेड़ असल में किसी बड़े एयर कंडीशनर की तरह काम करते हैं, जिससे गर्म शहरों में बहुत ज्यादा फर्क पड़ता है. पेड़ की घनी छांव के नीचे का तापमान आसपास के इलाके से तीन डिग्री तक कम हो सकता है. ऐसा इवैपोट्रांसपिरेशन यानी वाष्पोत्सर्जन की वजह से होता है. इस प्रक्रिया के तहत, पेड़ पानी सोखते हैं और अपनी पत्तियों के जरिए जलवाष्प छोड़ते हैं.
इसके अलावा, पेड़ छाया देते हैं, जिससे उनके आस-पास की जगह ज्यादा गर्म नहीं हो पाती है. टेक्निकल यूनवर्सिटी ब्राउनश्वाइग के इंस्टीट्यूट ऑफ जियोइकोलॉजी में हाइड्रोलॉजिस्ट माथियास बेयर कहते हैं, "जब हम किसी पेड़ के नीचे खड़े होते हैं, तो हमें महसूस होने वाला तापमान उसके ठीक बगल की जगह के मुकाबले 10 से 12 डिग्री सेल्सियस तक कम हो सकता है.”
बात सिर्फ ठंडक देने तक की नहीं है. कई अध्ययनों में घने और मजबूत पेड़ों के और भी कई फायदे सामने आए हैं. एक अध्ययन से पता चला कि जिन शहरों में ज्यादा पेड़-पौधे थे वहां दिल की बीमारियों की दर कम थी. एक अन्य अध्ययन का निष्कर्ष था कि स्कूल के आसपास जितनी ज्यादा हरियाली होगी, हाई स्कूल के बच्चों के अंक उतने ही अच्छे आते हैं. अन्य शोध से पता चलता है कि गर्भावस्था के दौरान हरियाली के बीच ज्यादा समय बिताने से नवजात शिशुओं की सेहत बेहतर हो सकती है.
सूखे में जीवित रहने के लिए पेड़ों को कितने पानी की जरूरत होती है?
हालांकि गर्म जलवायु की वजह से पेड़ों की जरूरत ज्यादा बढ़ जाती है, लेकिन इस वजह से उनके लिए अच्छी तरह पनपना भी मुश्किल हो जाता है. स्वस्थ पेड़ों को रोजाना कम से कम 10 से 15 लीटर पानी की जरूरत होती है, लेकिन पूरी तरह विकसित और पत्तों के घने आवरण वाले पेड़ों को इससे चार गुना ज्यादा पानी चाहिए होता है.
वैसे तो शहरों का ध्यान अक्सर ऐसे नए पेड़ लगाने पर चला जाता है जिन्हें कम पानी की जरूरत हो, लेकिन विशेषज्ञों की मानें तो असली प्राथमिकता उन पुराने पेड़ों को बचाने की होनी चाहिए जो इस मौसम में टिकने के लिए जूझ रहे हैं.
शोध से पता चलता है कि 20 मीटर के घेरे वाले एक पुराने पेड़ से मिलने वाले फायदों की भरपाई करने के लिए लगभग 400 पौधों की जरूरत होगी. जब पेड़ पूरी तरह से विकसित हो जाते हैं, तो उनसे मिलने वाले फायदे कई गुना बढ़ जाते हैं, लेकिन इसमें समय और बहुत देखभाल की जरूरत होती है.
स्वीडिश यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के रिसर्चर हेनरिक स्योमान कहते हैं, "बहुत से पेड़ ऐसे होते हैं जो लगाए जाने के 40-50 साल बाद, पर्यावरण और इंसान के लिए पूरी तरह फायदेमंद बन पाते हैं.”
पेड़ों को पानी देने का सबसे अच्छा तरीका
पेड़ों को कम समय में ही ज्यादा मात्रा में पानी देना बेहतर होता है, ताकि वह जमीन की गहराई तक चला जाए, बजाय इसके कि वह मिट्टी की ऊपरी परतों में ही रहे जहां से ज्यादातर पानी भाप बनकर उड़ जाता है.
नए लगाए गए पेड़ों के लिए, तने के चारों ओर अक्सर धातु या मजबूत प्लास्टिक का एक घेरा लगाया जाता है. जहां यह उपलब्ध न हो, वहां पेड़ के चारों ओर एक उथला गड्ढा बनाया जा सकता है, जिससे पानी जमा हो सके. ध्यान रखने वाली बात यह है कि इस प्रक्रिया में जमीन के ऊपर की जड़ों को कोई नुकसान न पहुंचे.
अगर मिट्टी बहुत सख्त और कड़क हो चुकी हो, तो तथाकथित सिंचाई वाले थैले (इरिगेशन बैग) या कुशन काम आ सकते हैं. इनके निचले हिस्से में बने छोटे छेदों के जरिए पानी धीरे-धीरे, लेकिन लगातार मिट्टी में रिसता रहता है. पानी का बहुत देर तक जमीन की सतह पर जमा रहना ठीक नहीं है, क्योंकि इससे सड़न पैदा हो सकती है जो पेड़ को नुकसान पहुंचाती है.
हालांकि, कभी-कभी फुटपाथ का भार संभालने के लिए मिट्टी को बहुत कसकर दबा दिया जाता है, जिससे पानी बिल्कुल भी अंदर नहीं जा पाता. तीस साल पहले, बासुक ने एक ऐसे तरीके की शुरुआत करने में मदद की थी जिसमें मिट्टी के साथ खास आकार की बजरी मिलाई जाती है. यह बजरी फुटपाथ का वजन सह लेती है, जिससे जड़ों को घने शहरी इलाकों में फैलने के लिए ज्यादा जगह मिल जाती है.
बासुक ने बताया, "अगर मिट्टी और पत्थर का अनुपात सही हो, तो आप उसे कसकर दबा भी सकते हैं और फिर भी पेड़ दूर-दूर तक फैल सकते हैं.”
जब जलवायु के हिसाब से ढलने की बात आती है, तो सबसे पहले यह सवाल उठता है कि कौन से पेड़ लगाए जाएं.
स्योमान का कहना है कि पहले सुंदरता और डिजाइन के आधार पर शहरों में लगाने के लिए पेड़ चुने जाते थे. इस वजह से एक ही तरह के पेड़ बहुत ज्यादा लगाए जाते थे, जो कीड़ों या बीमारियों की चपेट में आसानी से आ जाते थे. 20वीं सदी में ‘डच एल्म' बीमारी से पेड़ों की पूरी आबादी के खत्म होने की डरावनी कहानियों ने शहरी वानिकी योजना को बदलने में मदद की, जिससे अब अलग-अलग तरह की प्रजातियों के पेड़ और जलवायु के अनुकूल ढलने वाले पेड़ों पर ज्यादा ध्यान दिया जाने लगा है.
10-20-30 का नियम, 1990 में फ्रैंक सेंटामौर ने तैयार किया था, जो यूएस नेशनल अर्बोरेटम में रिसर्च जेनेटिसिस्ट के तौर पर काम करते थे. इस नियम के मुताबिक, शहरी जंगलों की आबादी में किसी भी एक प्रजाति का हिस्सा 10 फीसदी से अधिक, एक ही वंश (वंशानुक्रम) का 20 फीसदी से अधिक या किसी भी एक कुल (फैमिली) का 30 फीसदी से अधिक हिस्सा नहीं होना चाहिए.
जर्मनी में कई ऐसे टूल और डाटाबेस हैं जो पेड़ लगाने के बारे में जानकारी देते हैं. कई शहर एक आधिकारिक स्ट्रीट-ट्री टेस्ट में हिस्सा ले रहे हैं. इसका मकसद यह है कि 45 प्रजातियों का 220 से ज्यादा जगहों पर परीक्षण किया जाए, ताकि यह जानकारी जुटाई जा सके कि वे कैसे पनपते हैं.
इसके अलावा, ‘सीट्री (CITREE)' नाम का एक और कमाल का डाटाबेस है, जिसमें लकड़ी वाले पौधों की करीब 400 प्रजातियों की पूरी सूची है. इन्हें 50 से ज्यादा को अलग अलग विशेषताओं के आधार पर छांटा जा सकता है. मसलन, पेड़ की पत्तियां कितनी घनी हैं, फल का रंग कैसा है, उससे एलर्जी तो नहीं होगी या उसकी डालें आसानी से टूटती हैं या नहीं आदि.
शहरों को पेड़ चुनते समय जिस मुख्य विशेषता पर ध्यान देने की जरूरत है, वह है सूखा सहन करने की क्षमता, क्योंकि लगातार गर्म होती इस दुनिया में शहरी पेड़ बहुत बड़े जैविक तनाव का सामना कर रहे हैं. हालांकि, पेड़ किसी शहर को क्या-क्या फायदे पहुंचाते हैं, इसके बारे में जानने के बाद यह साफ है कि सिर्फ यही एक अकेला पैमाना नहीं है.
स्योमान कहते हैं, "आज के दौर में पेड़ों से हमारी जो उम्मीदें और जरूरतें हैं, वे 10-20 साल पहले के मुकाबले काफी ज्यादा बढ़ चुकी हैं और बहुत गहरी हो गई हैं.”
(The above story first appeared on LatestLY on Aug 28, 2026 07:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

