अर्थव्यवस्था को उबारने के लिये आरबीआई ने फिर घटाई ब्याज दर, कर्ज किस्तें पर तीन माह की और छूट

मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तय समय से पहले हुई बैठक में अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए रेपो दर में कटौती का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। समिति की पिछली बैठक मार्च अंत में हुई थी। तब भी रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 0.75 प्रतिशत की बड़ी कटौती की थी। तब पहली बार कर्ज किस्त के भुगतान पर तीन माह (मार्च- मई 2020) की छूट दी गई थी जिसे अब तीन माह और बढ़ाकर अगस्त 2020 तक कर दिया है।

मुंबई, 22 मई कोरोना वायरस के कारण लगातार सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये रिजर्व बैंक ने शुक्रवार को एक बार फिर प्रमुख नीतिगत दर रेपो में 0.40 प्रतिशत की अप्रत्याशित कटौती कर दी। इसके साथ ही कर्जदारों को कर्ज की किस्त चुकाने से तीन माह की और छूट दे दी है। ऐसी आशंका है कि चार दशक से अधिक समय में पहली बार भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की तरफ बढ़ रही है।

मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की तय समय से पहले हुई बैठक में अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए रेपो दर में कटौती का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। समिति की पिछली बैठक मार्च अंत में हुई थी। तब भी रिजर्व बैंक ने रेपो दर में 0.75 प्रतिशत की बड़ी कटौती की थी। तब पहली बार कर्ज किस्त के भुगतान पर तीन माह (मार्च- मई 2020) की छूट दी गई थी जिसे अब तीन माह और बढ़ाकर अगस्त 2020 तक कर दिया है।

आरबीआई ने निर्यात के लिए लदान से पहले और बाद में दिए जाने वाले कर्ज की समयसीमा को एक साल से बढ़ाकर 15 महीने कर दिया है, और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक को अपनी निवेश जरूरतें पूरी करने के लिए अतिरिक्त तीन महीने का समय दिया गया है।

रेपो दर में 0.40 प्रतिशत कटौती के बाद यह घटकर चार प्रतिशत रह गई है, जबकि रिवर्स रेपो दर भी इतनी ही घटकर 3.35 प्रतिशत रह गई है। रेपो दर वर्ष 2000 के बाद से अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है।

दास ने कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है और मुद्रास्फीति के अनुमान बेहद अनिश्चित हैं। उन्होंने कहा, ‘‘दो महीनों के लॉकडाउन से घरेलू आर्थिक गतिविधि बुरी तरह प्रभावित हुई है।’’ साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि शीर्ष छह औद्योगिक राज्य, जिनका भारत के औद्योगिक उत्पादन में 60 प्रतिशत योगदान है, वे मोटे तौर पर लाल या नारंगी क्षेत्र में हैं।

आर्थिक वृद्धि के अपने पहले आधिकारिक पूर्वानुमान में केंद्रीय बैंक ने कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वित्त वर्ष 2020-21 में घट सकती है। कोरोना वायरस महामारी और इसके चलते लागू लॉकडाउन के कारण ऐसा होगा।

कोरोना वायरस महामारी शुरू होने से पहले ही भारतीय अर्थव्यवस्था सुस्ती के दौर से गुजर रही थी और तब 2019-20 में जीडीपी वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत रहने का अनुमान था।

रिजर्व बैंक गवर्नर ने कहा कि मांग में गिरावट के संकेत मिल रहे हैं और बिजली तथा पेट्रोलियम उत्पादों की मांग घटी है। गवर्नर ने कहा कि सबसे अधिक झटका निजी खपत में लगा है, जिसकी घरेलू मांग में 60 फीसदी हिस्सेदारी है।

दास ने कहा कि मांग में कमी और आपूर्ति में व्यवधान के चलते चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में आर्थिक गतिविधियां प्रभावित होंगी। उन्होंने कहा कि 2020-21 की दूसरी छमाही में आर्थिक गतिविधियों में कुछ सुधार की उम्मीद है।

दास ने कहा कि कोरोना वायरस संकट के कारण कर्ज अदायगी पर स्थगन को तीन महीने और बढ़ा दिया है। अब कर्जदारों को अगस्त तक अपने कर्ज की किस्त चुकाने की अनिवार्यता नहीं है रिजर्व बैंक की तरफ से उन्हें राहत दे दी गई है।

इससे पहले मार्च में केंद्रीय बैंक ने एक मार्च 2020 से 31 मई 2020 के बीच सभी सावधि ऋण के भुगतान पर तीन महीनों की मोहलत दी थी। इसके साथ ही इन तरह के सभी ऋणों की अदायगी को तीन महीने के लिए आगे बढ़ा दिया गया था।

दास ने कहा कि छह महीने के ऋण स्थगन को सावधि ऋण में बदला जा सकता है।

आरबीआई ने कहा कि कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते आर्थिक गतिविधियां बाधित होने से भारत की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) वृद्धि वित्त वर्ष 2020-21 में नकारात्मक रहेगी।

दास ने कहा कि मुद्रास्फीति का दृष्टिकोण बेहद अनिश्चित है और दालों की बढ़ी कीमतें चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि कीमतों में नरमी लाने के लिए आयात शुल्क की समीक्षा करने की जरूरत है।

उन्होंने बताया कि वित्त वर्ष की पहली छमाही में प्रमुख मुद्रास्फीति की दर स्थिर रह सकती है और दूसरी छमाही में इसमें कमी आ सकती है। उनके मुताबिक चालू वित्त वर्ष की तीसरी या चौथी तिमाही में मु्द्रास्फीति की दर चार प्रतिशत से नीचे आ सकती है।

इसके अलावा दास ने कहा कि महामारी के बीच आर्थिक गतिविधियों के प्रभावित होने से सरकार का राजस्व बहुत अधिक प्रभावित हुआ है।

इसके अलावा बैंकों द्वारा कॉरपोरेट को दी जाने वाली ऋण राशि को उनकी कुल संपत्ति के 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया है। ऐसे में बैंक कंपनियों को अधिक कर्ज दे सकेंगे।

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