सूडान में हिंसा के बीच फंसे हजारों नागरिक, अंतरराष्ट्रीय समुदाय चिंतित

सत्ता संघर्ष में फंसे सूडान के अल फाशर शहर में हजारों लोगों पर खतरा मंडरा रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

सत्ता संघर्ष में फंसे सूडान के अल फाशर शहर में हजारों लोगों पर खतरा मंडरा रहा है. रविवार को इस शहर पर आरएसएफ गुट ने नियंत्रण किया. इसके बाद वहां से आ रही हिंसा और खून-खराबे की तस्वीरों से विश्व समुदाय चिंतित है.अल फाशर की सैटेलाइट तस्वीरों में इधर-उधर लाशें बिखरी दिख रही हैं. समाचार एजेंसी एएफपी के अनुसार राहत संगठन ‘डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने कहा कि शहर में अब भी बड़ी संख्या में लोग मौजूद हैं जिन्हें सुरक्षित स्थानों तक पहुंचने से रोका जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, अब तक लगभग 65 हजार लोग शहर से निकल चुके हैं, लेकिन दसियों हजार लोग अब भी वहीं हैं. साथ ही जहां भोजन, दवा और पानी, सबकी भारी कमी बताई जा रही है.

पिछले रविवार को अर्धसैनिक बल ‘रैपिड सपोर्ट फोर्सेज' (आरएसएफ) ने सूडानी सेना को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया और शहर पर कब्जा जमा कर लिया था. यह दारफुर क्षेत्र में सूडानी सेना का आखिरी मजबूत गढ़ माना जाता था, जो अब आरएसएफ के कब्जे में है.

गृह युद्ध का कारण

सूडान में गृहयुद्ध लंबे समय से जारी राजनीतिक और नस्लीय तनावों का नतीजा है. खासकर अप्रैल 2023 से देश मुख्य रूप से दो गुटों की खींचतान का शिकार है. दोनों पक्षों का दावा है कि वे देश की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखना चाहते हैं. लेकिन इस संघर्ष का मकसद सत्ता पर नियंत्रण और सैन्य प्रभुत्व हासिल करना है. इसमें क्षेत्रीय संसाधनों और राजनीतिक प्रभाव को लेकर तनाव भी शामिल रहा है. मौजूदा संघर्ष में एक तरफ है जनरल अब्देल फतह अल बुरहान के नेतृत्व में सूडानी आर्म्ड फोर्सेस (एसएएफ) यानी सूडानी सेना और दूसरी तरफ है जनरल मोहम्मद हमदान दागालो के नेतृत्व वाले अर्धसैनिक बल रैपिड सपोर्ट फोर्सेज (आरएसएफ).

अंतरराष्ट्रीय संगठन और संयुक्त राष्ट्र ने लगातार चेतावनी दी है कि स्थिति बिगड़ती जा रही है और जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने इस स्थिति को ‘अपोक्लिपिटक' यानी कयामत जैसा बताया है. गृहयुद्ध में नागरिक अक्सर हिंसा, लूटपाट और मानवाधिकार हनन के शिकार होते हैं. सूडान के शहरों और गांवों पर कब्जा, सामूहिक हत्याएं, बलात्कार और बंधक बनाए जाने जैसी घटनाएं आम हो गई हैं. संघर्ष के कारण लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं और लाखों को खाना, पानी और चिकित्सा सहायता की कमी का सामना करना पड़ रहा है.

भागने की कोशिशों के बीच बढ़ता भय और हिंसा

राहत संस्था डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स के अनुसार, केवल पांच हजार लोग तवीला कस्बे तक पहुंच पाए हैं, जो अल-फाशर से लगभग 70 किलोमीटर दूर है. संगठन के आपातकालीन प्रमुख मिशेल ओलिवियर लाशारिते ने कहा, "कई लोग लापता हैं और उनके बारे में कोई जानकारी नहीं है.” चश्मदीदों ने एएफपी को बताया कि भागने की कोशिश करने वाले नागरिकों को रास्ते में रोककर लूटा गया या गिरफ्तार कर लिया गया.

हयात नाम की महिला ने बताया, "हमारे साथ यात्रा कर रहे नौजवानों को आरएसएफ ने रोक लिया, हमें नहीं पता उनके साथ क्या हुआ.” संयुक्त राष्ट्र ने बताया कि शहर में सामूहिक हत्याओं और हमलों की घटनाएं सामने आई हैं और संचार व्यवस्था लगभग पूरी तरह ठप है. येल विश्वविद्यालय के शोध केंद्र ने सैटेलाइट तस्वीरों के आधार पर कहा कि हाल के दिनों में शहर से बड़े पैमाने पर पलायन के कोई संकेत नहीं मिले हैं, जिससे आशंका है कि कई लोग अब भी फंसे हुए हैं या मारे जा चुके हैं.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय चिंतित

ब्रिटेन, जर्मनी और जॉर्डन के विदेश मंत्रियों ने सूडान के अल-फाशर में हालिया हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघनों की निंदा की है और तुरंत युद्धविराम की अपील की है. उन्होंने कहा कि वहां नागरिकों की सुरक्षा खतरे में है और महिलाओं व बच्चों को सबसे ज्यादा कठिनाइयां झेलनी पड़ रही हैं. उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी पक्षों को हिंसा रोकनी चाहिए और मानवीय सहायता पहुंचाने की अनुमति देनी चाहिए.

बहरीन में आयोजित एक सम्मेलन में जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वडेफुल ने कहा, "सूडान की स्थिति गंभीर मानवीय संकट बन चुकी है.” ब्रिटेन की विदेश मंत्री यवेट कूपर ने कहा, "नागरिकों पर अत्याचार और हिंसा की खबरें बहुत चिंताजनक हैं.”

इस बीच, आरएसएफ ने दावा किया कि उसने अपने कुछ लड़ाकों को गिरफ्तार किया है जो अल-फाशर में अत्याचारों और हिंसा में शामिल थे, लेकिन संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों ने इसकी जांच पर सवाल उठाए हैं. रिपोर्टों के अनुसार, आरएसएफ को कुछ विदेशी समर्थन भी मिला है, जबकि सूडानी सेना को क्षेत्रीय देशों का सहयोग प्राप्त है.

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