देश की खबरें | भारत में जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध: लेखक मनोज मित्ता

नयी दिल्ली, पांच मई लेखक-पत्रकार मनोज मित्ता ने कहा है कि जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून के बारे में जानकारी तलाशना संघर्ष के समान है क्योंकि ब्रिटिश शासन के बाद से बहुत कम दस्तावेजीकरण किया गया है।

लेखक अस्पृश्यता के खिलाफ भारत के पहले कानून का दस्तावेजीकरण किए जाने के बारे में बोल रहे थे, जिसे 1924 में मद्रास के दलित वर्ग के विधायक आर वीरियन ने आगे बढ़ाया था।

मित्ता ने कहा, ‘‘दस्तावेजीकरण को लेकर हमारी संस्कृति बहुत कमजोर है, हमारे इतिहास पर उस समय के वर्चस्ववादी हितों का प्रभाव है। इन उल्लेखनीय प्रयासों, उपलब्धियों को कभी उनका हक नहीं मिला।’’

उन्होंने कहा, ‘‘वह (वीरियन) ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सभी बाधाओं के बावजूद एक कानून बनाया। यह बहुत मजबूत कानून नहीं था, लेकिन यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया की शुरुआत थी और फिर भी हम इसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं।’’

अपनी नयी किताब ‘कास्ट प्राइड’ के विमोचन के मौके पर मित्ता ने कहा कि अगर वह अमेरिका में कानून और नस्ल के बारे में लिख रहे होते, तो कुछ भी नया लिखने के लिए संघर्ष करना पड़ता।

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन जब भारत में जाति और इससे संबंधित कानून की बात आती है, तो यह एक अछूता क्षेत्र है। इस पर बहुत कम काम हुआ है। इसमें बहुत बड़ा अंतराल था और इस तरह की बड़ी उपलब्धियां थीं जिनके बारे में बात की जानी है।’’

वीरियन की लंबी कानूनी और विधायी लड़ाई ने तत्कालीन मद्रास में निचली जाति के लोगों को सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच प्रदान की, जिसमें मंदिरों के आसपास की सड़कें भी शामिल थीं, जो पहले वंचित वर्गों के सदस्यों के लिए सीमा से बाहर थीं।

वायसराय इरविन ने औपचारिक रूप से 13 जनवरी, 1927 को विधेयक को अपनी मंजूरी दी और कानून को 1927 के अधिनियम एक के रूप में अधिसूचित किया गया।

मित्ता ने कहा, ‘‘यह अस्पृश्यता के खिलाफ अब तक का पहला कानून था, और हमें इसके बारे में पता भी नहीं है। जबकि यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि इसे एक दलित ने आगे बढ़ाया। हमारे लिए इसके बारे में जानने का, उपलब्धि का जश्न मनाने का एक कारण होना चाहिए। आंबेडकरवादी जमात का हिस्सा नहीं होने के कारण वीरियन को उनका हक कभी नहीं मिला।’’

वेस्टलैंड द्वारा प्रकाशित किताब भारत में जाति-आधारित सामूहिक हिंसा के इतिहास को स्वतंत्रता-पूर्व और बाद के सामाजिक-कानूनी सुधारों के संदर्भ में देखती है।

मित्ता इससे पहले 1984 के सिख नरसंहार पर ‘व्हेन ए ट्री शुक डेल्ही’ और 2002 के गोधरा कांड पर ‘मोदी एंड गोधरा: द फिक्शन ऑफ फैक्ट-फाइंडिंग’ जैसी किताबें लिख चुके हैं।

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