पश्चिमी देशों की धारणाओं को तोड़ते अमेजोनिया के आदिवासी
आदिवासी समुदायों और अमेजन वर्षावन को लंबे समय से रहस्यमय रूप में पेश किया गया है.
आदिवासी समुदायों और अमेजन वर्षावन को लंबे समय से रहस्यमय रूप में पेश किया गया है. जर्मनी के बॉन शहर में लगी एक नई प्रदर्शनी इन पुरानी धारणाओं को चुनौती देती है.यूरोपीय इतिहास में दक्षिण अमेरिकी अमेजन को अक्सर एक विशाल और अछूते क्षेत्र के रूप में देखा गया है. समय के साथ-साथ अमेजन के प्रति कई धारणाएं बनती गईं. वर्षावन को "अछूता" जंगल माना जाने लगा, वहां के आदिवासियों को पुराने युग से जोड़ा गया और इस पूरे इलाके को समय में रुका हुआ दिखाया गया. परिणामस्वरूप इस जटिल और विविधता से भरपूर क्षेत्र को मात्र एक ‘एक्जॉटिक बैकड्रॉप' के रूप में देखा जाने लगा.
"अमेजन" का यह एकल चित्रण और एकरूप जंगल मानने की यह धारणा असल में "अमेजोनिया" के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विविधता से बिल्कुल मेल नहीं खाता. इसी विषय पर बॉन में आयोजित यह प्रदर्शनी केंद्रित है.
नजरिए में बदलाव
मानवविज्ञानी लेआंड्रो वेरिसन और ब्राजीलियाई कलाकार तथा कार्यकर्ता डेनिलसन बानिवा ने इस प्रदर्शनी का संयुक्त रूप से आयोजन किया है. "अमेजोनिया. इंडीजीनस वर्ल्ड्स" नामक इस प्रदर्शनी का मकसद है दुनिया के इस हिस्से पर एक सूक्ष्म और समझदार नजरिया प्रस्तुत करना.
यह प्रदर्शनी अमेजोनिया को ऐसे सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करती है, जो जटिल सामाजिक संरचनाओं, आदान‑प्रदान के घने जाल और मानव तथा गैर‑मानव संसारों के रिश्तों से गठित है.
वेरिसन ने डीडब्ल्यू को बताया, "आदिवासियों को हमेशा ऐसे दिखाया जाता है जैसे वे इतिहास से अलग हो - न वे बदलते हैं, न विकसित होते हैं. लेकिन संस्कृति जीवित है, इसका मतलब यह है कि वह लगातार विकसित और परिवर्तित होती रहती है."
इसलिए सामान्य संग्रहालयों की समय-रेखा का पालन करने की जगह, क्यूरेटरों ने प्रदर्शनी को आदिवासी समुदाय के दृष्टिकोण के अनुसार व्यवस्थित किया है.
"अमेजोनिया" एक बहुत ही बड़ा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक क्षेत्र है, जो ब्राजील, बोलिविया, पेरू, इक्वाडोर, कोलंबिया, वेनेजुएला, गयाना, सूरीनाम और फ्रेंच गयाना में फैला हुआ है. यह क्षेत्र अमेजन नदी के आस-पास स्थित है और इसे कई लैटिन अमेरिकी शैक्षणिक और आदिवासी संदर्भों में इस्तेमाल किया जाता है.
यह विश्व के उन क्षेत्रों में से एक है जहां भाषाओं की सबसे अधिक विविधता पाई जाती है.
विद्वानों का अनुमान है कि यूरोप में 16वीं शताब्दी में शुरू हुए विदेशी आक्रमणों से पहले इस क्षेत्र में 1,000 से भी ज्यादा भाषाएं मौजूद थीं. आज भी यहां 300 से ज्यादा आदिवासी भाषाएं बोली जाती है, जिनमें संकेत भाषाएं, सीटी से संवाद करने वाली और ढोल के माध्यम से संवाद करने वाली भाषाएं भी शामिल हैं. वेरिसन के अनुसार, यह यूरोपीय संघ की 24 आधिकारिक भाषाओं की तुलना में काफी बड़ा अंतर है. अगर आप महाद्वीप पर बोली जाने वाली 60 से अधिक क्षेत्रीय या अल्पसंख्यक भाषाओं को भी शामिल कर लें, तब भी यह काफी प्रभावशाली है.
यह विषय, जैसे सृष्टि की कहानियां, समुदाय के बीच संबंध और आदिवासियों का भविष्य के प्रति दृष्टिकोण हमें यह समझाने में मदद करते हैं कि अमेजोनिया में संस्कृति जीवित है, न कि स्थिर या अलग-थलग.
बदलता हुआ रुख
कुछ कलाकृतियां इस बात की ओर ध्यान दिलाती हैं कि यूरोपीय लेखों में आदिवासी समुदाय को किस तरह देखा या अनदेखा किया जा रहा है.
ऐसा ही एक प्रभावशाली काम है "कार्टा ओ वेल्हो मुंडो” (पुरानी दुनिया को पत्र, 2018–2019), जो दिवंगत मकुशी कलाकार और कार्यकर्ता जैडर एसबेल ने बनाया था. यह रचना उन्होंने तब की, जब उन्हें एक पुरानी किताबों की दुकान से 1972 की "गैलेरिया डेल्टा डा पिंटूरा यूनवर्सल ” नाम की एनसाइक्लोपीडिया मिली, जो पश्चिमी कला को ‘सार्वभौमिक' बताती थी.
लगभग 400 पन्नों वाली इस यूरोपीय कला‑पुस्तक के हर हिस्से पर उन्होंने सीधे ही चित्र बना दिए, रंग भरे और लिखावट भी की. उन्होंने इसमें आदिवासी मान्यताओं, पर्यावरण को लेकर चेतावनियां और "पुरानी दुनिया” के लिए सीधी टिप्पणियां भी जोड़ीं. यह एक ऐसा कदम है जो उपनिवेशवाद की सोच को चुनौती देता है और दिखाता है कि इस किताब में दिखाया गया "सार्वभौमिक” कला इतिहास असल में औपनिवेशिक नजरिए से बनाया गया था.
डेनिलसन बनिवा की इस कलाकृति "काकादोरेस दे फिक्सोएस कोलोनियाइस" (2021) में पुरानी फोटो का उपयोग किया गया है. इनका उपयोग पहले आदिवासी समुदाय को अलग और अजीब दिखाने के लिए किया जाता था. अपनी तस्वीरों में वह पॉप कल्चर के किरदार भी जोड़ते हैं, जैसे 'बैक टू द फ्यूचर' वाली कार, किंग कांग और गॉडजिला. इन सब चीजों को वह तस्वीरों में जोड़कर अजीब से दृश्य बनाते हैं और यह दिखाते हैं कि इस तरह के फोटो और ज्ञान ने आदिवासियों के प्रति कैसे गलत धारणा स्थापित की है.
लेआंड्रो वेरिसन को अक्सर इस बात का सामना करना पड़ता है कि कलाकृतियां किस तरह हमेशा आम धारणा को दर्शाती है. उनका कहना है, "लोगों की सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि आदिवासी लोग सिर्फ अतीत में रहते हैं और बदलाव नहीं चाहते हैं. वह यह भी कहते हैं कि आज उनके पास मोबाईल फोन या सोशल नेटवर्क होने का मतलब यह नहीं है कि उन्होंने "अपनी संस्कृति खो दी है, बल्कि इसका मतलब यह है कि वह अपने तरीके से खुद को ढाल रहे हैं."
उनका यह भी कहना है कि "अगर हम पश्चिमी लोग अपने आप को बदलने का अधिकार रखते हैं, तो आदिवासी समुदाय को यह अधिकार क्यों नहीं?"
आखिर किसने किसको खोजा?
एक प्रश्न यह भी उठता है कि "खोज" का अर्थ क्या है और वास्तव में किसने किसकी खोज की.
शोध के मुताबिक, अमेजन में पहले लाखों लोग रह रहे थे. वह वन उद्यानों का विकास करते थे और कोयला एवं जैविक पदार्थ मिलाकर "टेरा प्रेटा" नामक मिट्टी बनाते थे. यह एक उपजाऊ और कार्बन-समृद्ध मिट्टी होती है.
पुराने अध्ययनों से पता चलता है कि कई प्रसिद्ध पेड़ों की प्रजातियां जैसे ब्राजील नट, कोको और अकाई हजारों साल पहले से आदिवासी उगाते थे. आश्चर्य की बात यह है कि इस समुदाय ने यूरोपियों के आने से पहले इन पेड़ों को उगाना शुरू कर दिया था.
ऐसी खोज इस गलत धारणा पर सवाल उठाती है कि वन पूरी तरह से अछूते थे और यह बताती है कि वहां मानव की मौजूदगी और संरक्षण का इतिहास लंबे समय से चला आ रहा है.
समय का बदलता एहसास
यह प्रदर्शनी इस विचार को सामने लाती है कि कई आदिवासी समुदाय समय और इतिहास को बीते हुए अतीत की बात नहीं मानते, बल्कि उसे आज भी जीवित और सक्रिय मानते हैं. यह इतिहास उनके पूर्वजों, धरती और जीवित दुनिया के माध्यम से जीवित रहता है. आदिवासियों का यही दृष्टिकोण तय करता है कि वह अतीत को कैसे याद करते हैं और आज के समय में अपनी जिम्मेदारियों को कैसे समझते हैं.
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इस प्रदर्शनी में उन रिश्तों पर भी जोर दिया गया है जो न केवल इंसानों के बीच, बल्कि आत्माओं, गैर मानव प्राणियों और प्रकृति में मौजूद अन्य जीवों के बीच होते है. वेरिसन इन्हें "मानव से अलग जीव" मानते हैं. इसमें उन संबंधों को भी शामिल किया गया है जिन्हें वह "अलग प्रकार" के मानते हैं. प्रदर्शनी के अनुसार, हाल ही में "श्वेत लोगों" को इस श्रेणी में जोड़ा गया है. उन्हें शामिल करने की वजह उनका गोरा रंग नहीं, बल्कि दुनिया को देखने का अलग नजरिया है.
वेरिसन उन समुदायों का भी उल्लेख करते हैं, जिन्होंने आज के इस दौर में दुनिया से अलग थलग रहने का निर्णय लिया है. वेरिसन बताते हैं, "एकांत में रहने वाले लोग अतीत का हिस्सा नहीं हैं. वह आज भी हमारे साथ वर्तमान में जी रहे हैं. अंतर बस यह है कि उन्होंने एक अलग जीवनशैली का चुनाव किया है."
यह प्रदर्शनी आदिवासी समुदाय को उनके अतीत की छवि तक ही सीमित नहीं रखती, बल्कि उनके ज्ञान, परंपराओं और जीवन के दृष्टिकोण को आज के समय में स्थापित करती है. यह दिखाती कि उन्होंने कैसे इन संस्कृतियों ने उतार चढ़ाव के बावजूद अपनी विरासत को संभाला है. यह प्रदर्शनी अमेजोनिया को एक गतिशील और जीवित इतिहास के रूप में प्रस्तुत करती है.
"अमेजोनिया. इंडीजीनस वर्ल्ड्स" प्रदर्शनी 9 अगस्त 2026 तक चलने वाली है.
(The above story first appeared on LatestLY on Mar 27, 2026 03:50 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

