प्रेस में क्या प्रकाशित होना चाहिए इसे पहले से तय करने वाला कोई प्राधिकार नहीं हो सकता: अदालत
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नयी दिल्ली, 15 मई व्यक्ति विशेष की मृत्यु के संबंध में एक निजी अस्पताल के खिलाफ कथित मानहानि कारक सूचनाएं प्रसारित करने से हिन्दी समाचार चैनलों को रोकने से इंकार करते हुए दिल्ली की एक अदालत ने कहा कि प्रेस में क्या प्रकाशित/प्रसारित हो सकता है इसपर पहले से फैसला करने वाला प्राधिकार कोई नहीं बन सकता है।

वाणिज्यिक अदालत के जिला न्यायाधीश मनमोहन शर्मा ने हालांकि, समाचार चैनलों और उसके दो संवाददाताओं से कहा कि वे अस्पताल के विचार और उसके प्रतिनिधियों द्वारा उपलब्ध कराए गए तथ्यों को भी दिखाएं।

अदालत ने कथित तौर पर एक गलत खबर दिखाने और घटना का एक ही पहलू दिखाकर अस्पताल को बदनाम करने से समाचार चैनल को रोकने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई करने हुए उक्त टिप्पणी की।

गौरतलब है कि पांच मई को दो समाचार चैनलों के रिपोर्टरों ने खबर दिखाई कि हालत गंभीर होने के बावजूद एक निजी अस्पताल ने 60 वर्षीय मरीज को इलाज के लिए अपने यहां भर्ती नहीं किया और उसकी मौत हो गई।

अदालत ने समाचार चैनल को निर्देश दिया है कि वह आदेश प्राप्त होते ही दो दिन के भीतर इस खबर पर अस्पताल के विचार भी प्रसारित करे और जब भी इस घटना के संबंध में प्रिंट, इलेक्ट्रॉलिक, सोशल या अन्य किसी मीडिया में खबर लिखी जाए, उसमे अस्पताल का विचार जरूर शामिल किया जाए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि प्रेस को स्वतंत्रता देने के साथ ही उससे आशा की जाती है कि वह उतनी ही जिम्मेदारी से उसे लिखेगा।

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