देश की खबरें | शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द किया, कहा: शिक्षा शिक्षाविदों पर छोड़ दी जाए

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि ‘‘शिक्षा शिक्षाविदों के लिए छोड़ देनी चाहिए।’’ इसके साथ ही न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2018 के एक फैसले को रद्द कर दिया जिसमें व्यवस्था दी गयी थी कि एमएड की उपाधि वाले किसी व्यक्ति को शिक्षा विषय के सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 12 अक्टूबर उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि ‘‘शिक्षा शिक्षाविदों के लिए छोड़ देनी चाहिए।’’ इसके साथ ही न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2018 के एक फैसले को रद्द कर दिया जिसमें व्यवस्था दी गयी थी कि एमएड की उपाधि वाले किसी व्यक्ति को शिक्षा विषय के सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्त नहीं किया जा सकता।

यह विवाद इस विषय पर केंद्रित था कि क्या कोई एमएड उपाधि प्राप्त व्यक्ति सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति के लिए एमए (शिक्षा) के समकक्ष माना जा सकता है। उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग (यूपीएचईएसएससी) ने मार्च, 2014 में इस पद के लिए विज्ञापन प्रकाशित किया था।

यह भी पढ़े | Andhra Pradesh: जादू-टोना के शक में गांव के कुछ अज्ञात लोगों ने एक व्यक्ति को पीट-पीटकर जिंदा जलाया, मामला दर्ज.

यूपीएचईएसएससी ने चार शिक्षाविदों की एक विशेषज्ञ समिति की मदद ली जिन्होंने राय दी कि सहायक प्रोफेसर (शिक्षा), कला संकाय के लिए एमएड की डिग्री के साथ-साथ एमए (शिक्षा) की योग्यता को स्वीकार किया जाना चाहिए।

इस राय के आधार पर रोजगार प्राधिकरण यूपीएचईएसएसी ने 11 जुलाई, 2016 को संशोधन जारी किया तथा इन दो उपाधियों वाले उम्मीदवारों को प्रतिस्पर्धा के लिए अनुमति दे दी।

यह भी पढ़े | IPL 2020: बैंगलोर की टीम ने कोलकाता नाईट रायडर को 82 रनों से हराया: 12 अक्टूबर 2020 की बड़ी खबरें और मुख्य समाचार LIVE.

लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने 14 मई, 2018 को कहा कि एमए (शिक्षा) संबंधित विषय में मास्टर डिग्री है जबकि एमएड ऐसा नहीं है और यह केवल एक प्रशिक्षण योग्यता है।

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि निष्कर्ष यह निकला कि एमएड उपाधि वाले व्यक्ति को शिक्षा में सहायक प्रोफेसर पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही पीठ ने 11 जुलाई, 2016 के संशोधन को रद्द कर दिया था।

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति एस के कौल, न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने उच्च न्यायालय के फैसले को गलत करार देते हुए उसे रद्द कर दिया। इसके साथ ही पीठ ने एक उम्मीदवार आनंद यादव की अपील को मंजूरी प्रदान कर दी।

पीठ ने कहा, ‘‘हम इस तथ्य के मद्देनजर कहते हैं कि शिक्षा से जुड़े मामलों को शिक्षाविदों के लिए छोड़ दिया जाना चाहिए, निश्चित रूप से संबंधित कानूनों और नियमों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए... विशेषज्ञों के निर्णय पर एक विशेषज्ञ निकाय के रूप में बैठना इस अदालत का कार्य नहीं है, खासकर तब जबकि विशेषज्ञ सभी प्रतिष्ठित लोग हैं जो नामों से स्पष्ट हैं...।’’

(यह सिंडिकेटेड न्यूज़ फीड से अनएडिटेड और ऑटो-जेनरेटेड स्टोरी है, ऐसी संभावना है कि लेटेस्टली स्टाफ द्वारा इसमें कोई बदलाव या एडिट नहीं किया गया है)

Share Now

\