देश की खबरें | शस्त्र व्यापार संधि पर अप्रासंगिकता का खतरा
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. नयी दिल्ली, 22 अगस्त (360 इन्फो) यदि शस्त्र व्यापार संधि के अनेक पक्षकार देश समझौते के उद्देश्यों के लिए अपनी प्रतिबद्धता को दोहराएं तो वास्तविक बदलाव होते देख सकते हैं।
नयी दिल्ली, 22 अगस्त (360 इन्फो) यदि शस्त्र व्यापार संधि के अनेक पक्षकार देश समझौते के उद्देश्यों के लिए अपनी प्रतिबद्धता को दोहराएं तो वास्तविक बदलाव होते देख सकते हैं।
संयुक्त राष्ट्र शस्त्र व्यापार संधि (एटीटी) की सदस्यता बढ़ रही है। समझौता 2014 में प्रभाव में आया था और तब से 111 देशों ने इसे स्वीकृति दी है और 30 और देशों ने इस पर हस्ताक्षर किये हैं।
हालांकि परंपरागत हथियारों के हस्तांतरण को नियमित करने के संधि के प्रयासों पर एटीटी के पक्षकार देशों तथा अन्य शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा लगातार सवाल खड़े किये जा रहे हैं, उनकी अनदेखी की जा रही है और तोड़ा जा रहा है।
जिनेवा में 22 से 26 अगस्त तक एटीटी के सदस्यों के आठवें वार्षिक सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा ताकि उसके भविष्य और प्रमुख चुनौतियों पर विचार-विमर्श हो सके।
एटीटी के सभी पक्षकार देशों को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होती हैं, जिनमें पिछले साल में परंपरागत हथियारों में उनके व्यापार का ब्योरा हो। लेकिन संधि पर हस्ताक्षर करने वाले देशों की बढ़ती संख्या के साथ इसका अनुपालन करने वालों का अनुपात कम हो गया है। 2015 में यह 84 प्रतिशत था जो 2021 में कम होकर महज 52 प्रतिशत रह गया।
इसका आशय हुआ कि करीब आधे पक्षकार देश अपनी रिपोर्ट जमा नहीं कर रहे या परंपरागत हथियारों में व्यापार नहीं करते, जिसका अर्थ हुआ कि उनकी गतिविधियों में संधि के उद्देश्यों को अहमियत नहीं दी गयी।
दुनियाभर में कौन हथियारों की आपूर्ति करता है और प्राप्त करता है?
निस्संदेह अधिकतर अंतरराष्ट्रीय समझौतों की एक जैसी सीमाएं हैं और खासतौर पर जब महाशक्तियां इनका समर्थन नहीं करतीं तो उनके उल्लंघन का खतरा बढ़ जाता है। लेकिन एटीटी के दायरे में परंपरागत शस्त्रों के दुनिया के बड़े आयातकों और निर्यातकों दोनों को लाने में सफलता नहीं मिली है।
परंपरागत हथियारों के दुनिया के सबसे बड़े विनिर्माता और निर्यातक अमेरिका ने 2013 में एटीटी पर हस्ताक्षर किये थे लेकिन कभी इसे स्वीकृत नहीं किया या कानूनन इसके प्रति बाध्यता नहीं जताई। अप्रैल, 2019 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका एटीटी पर हस्ताक्षर करके जताये गये अपने समर्थन को वापस लेगा।
संधि में हालांकि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है और केवल अग्रिम नोटिस देकर समर्थन वापस लिया जा सकता है। मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडन ने अभी तक ट्रंप के ‘हस्ताक्षर के प्रभाव को वापस लेने’ संबंधी बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
दूसरे बड़े निर्यातक रूस ने अभी तक इस पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं और इसके दायरे से बाहर बना हुआ है। चीन जुलाई 2020 में इसमें शामिल हुआ था लेकिन दुनिया के सबसे बड़े आयातक भारत ने भी अभी तक इस पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं।
ऐसा नहीं है कि शक्तिशाली देशों की शस्त्र व्यापार को नियंत्रित करने में कोई रुचि नहीं है। वे विशेष रूप से जनसंहार के हथियारों (डब्ल्यूएमडी) के खतरों पर प्रभावी तरीके से प्रतिक्रिया देते रहे हैं। वे मानते हैं कि इन हथियारों से उनकी खुद की सुरक्षा को खतरा है।
उन्होंने बैलिस्टिक मिसाइलों और उनकी प्रौद्योगिकियों, सामग्रियों आदि के प्रसार समेत डब्ल्यूएमडी के हस्तांतरण पर मजबूत नियामक व्यवस्थाएं लागू की हैं।
इसी तरह, प्रमुख महाशक्तियों के महंगे डब्ल्यूएमडी आधुनिकीकरण कार्यक्रमों के कारण उनके संबंधित हथियार-नियंत्रण केवल उन शस्त्रों पर केंद्रित होते हैं जिन्हें वे पहले से ही त्यागने की योजना बना रहे थे।
इसने उन्हें उन डब्ल्यूएमडी पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति दी है जिनके आविष्कार या अधिग्रहण के लिए कम शक्तिशाली राष्ट्र अभी भी संघर्ष कर रहे हैं और इस तरह वे इन प्रभुत्वशाली देशों के उनके शस्त्रागार से कम शक्तिशाली राष्ट्रों की सूची के आयुध भंडार के बीच के अंतराल को बढ़ाकर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर रहे हैं।
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