देश की खबरें | भारत में हरित अर्थव्यवस्था में बदलाव की गति तेज नहीं : विशेषज्ञ
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नयी दिल्ली, 15 जून विशेषज्ञों ने उत्सर्जन कम करने के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण अपनाने की सरकार से अपील करते हुए बुधवार को कहा कि भारत वायु प्रदूषण रोकने के लिए कदम तो उठा रहा है, लेकिन हरित अर्थव्यवस्था में बदलाव की गति में पर्याप्त तेजी नहीं है।
यह टिप्पणी अमेरिका स्थित एक शोध संस्थान के उस अध्ययन के एक दिन बाद आई है, जिसमें कहा गया है कि अगर पीएम2.5 प्रदूषण कम करने के लिए डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया गया तो औसत भारतीय की जीवन प्रत्याशा पांच साल कम हो जाएगी।
अध्ययन ने भारत में वायु प्रदूषण में बढ़ोतरी के लिए पिछले दो दशकों में हुए औद्योगीकरण, आर्थिक विकास और जनसंख्या वृद्धि को जिम्मेदार ठहराया है, जिसके कारण ऊर्जा की मांग में वृद्धि हुई है और जीवाश्म ईंधन का उपयोग बढ़ा है।
इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) चंद्र भूषण ने कहा, ‘‘ये अध्ययन हमें वायु प्रदूषण की समस्या को हल करने के हमारे संघर्ष के बारे में याद दिलाते हैं। वे मूल रूप से हमें मानव स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था की दृष्टि से वायु प्रदूषण की भारी कीमत के बारे में आगाह करते हैं...हमें याद दिलाते रहते हैं कि हम कहां असफल रहे हैं।’’
यह एक स्वतंत्र गैर-लाभकारी पर्यावरण अनुसंधान और नवाचार संगठन है।
उन्होंने कहा कि भारत एक गरीब देश है और विकास महत्वपूर्ण है लेकिन विकल्प ‘हरित विकास’ ही है।
उन्होंने कहा, ‘‘हमने ऊर्जा क्षेत्र में अच्छी शुरुआत की है और नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ रही है, लेकिन वह पर्याप्त तेजी से नहीं बढ़ रही हैं। हम 175-गीगावाट लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाएंगे, जो हमने (2022 में) निर्धारित किया है।’’
सफर के संस्थापक परियोजना निदेशक गुफरान बेग ने कहा कि सरकार को वायु प्रदूषण को कम करने और स्रोत पर उत्सर्जन को लक्षित करने के अपने प्रयासों में तेजी लानी चाहिए।
सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर के सुनील दहिया ने कहा कि एपिक द्वारा किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि राष्ट्रीय स्वच्छ वायु जैसे कार्यक्रम शुरू करने के बावजूद, वायु प्रदूषण पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है।
उन्होंने कहा, ‘‘इसका मतलब या तो हमारी नीतियों में कुछ कमी है या हम उन्हें ठीक से लागू नहीं कर पाए हैं। सरकार न तो जीवाश्म ईंधन की खपत को नियंत्रित करने में सक्षम है, न ही उत्सर्जन रोकने के लिए सक्रिय कार्रवाई कर रही है।’’
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