देश की खबरें | संविधान के बारे में जितना अधिक जानेंगे, उतना ही हम राष्ट्रवाद की तरफ अग्रसर होंगे: उपराष्ट्रपति

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छत्रपति संभाजीनगर, 22 फरवरी उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने शनिवार को यहां कहा कि लोगों को उनके मौलिक अधिकार प्रदान करने वाले संविधान के बारे में हम जितना अधिक जानेंगे, उतना ही हम राष्ट्रवाद की ओर अग्रसर होंगे।

संविधान जागरुकता वर्ष समारोह के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि लोगों को राजनीति और व्यक्तिगत हितों से ऊपर राष्ट्रवाद को अपना सबसे बड़ा धर्म समझना चाहिए और चुनौतियों का सामना करते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने भारत में मतदाता मतदान बढ़ाने के लिए यूएसएआईडी द्वारा कथित तौर पर किए गए वित्त पोषण के हालिया खुलासे का स्पष्ट संदर्भ देते हुए कहा, ‘‘देश के सामने एक चुनौती है। बाहर से धन प्राप्त करके, लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपवित्र बनाया जा रहा है। उनके (दानदाताओं) द्वारा चुने गए लोगों को चुनाव जिताया जा रहा है। यह खतरनाक है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है।’’

धनखड़ ने कहा, ‘‘हमारे संविधान के बारे में जागरुकता आज सबसे बड़ी जरूरत है। हमारे संविधान निर्माता तपस्वी थे जिन्होंने देश की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी। वे ऐसा संविधान बनाना चाहते थे जो सभी की अपेक्षाओं को पूरा करे। उन्होंने चुनौतियों का समाधान सार्थक संवाद, उच्च स्तरीय बहस के जरिए किया, न कि बहिष्कार के जरिए। उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर की प्रतिष्ठा को कभी कम नहीं होने दिया।’’

संसदीय कार्यवाही में व्यवधान का स्पष्ट संदर्भ देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि अगर सदन को चलने नहीं दिया गया तो लोगों के पास चर्चा के जरिए अपने मुद्दों को हल करने का कोई रास्ता नहीं होगा।

उन्होंने जोर देकर कहा, ‘‘जब संवाद से हर समस्या का समाधान हो सकता है तो लोकतंत्र के मंदिरों पर इतना दबाव क्यों है? निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना चाहिए, राष्ट्रवाद को अपना धर्म और भारतीयता को अपनी पहचान मानना ​​चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि पिछले 10 वर्षों से संविधान दिवस मनाया जा रहा है ताकि नई पीढ़ी को पता चले कि देश को सर्वोच्च बलिदानों के कारण आजादी मिली है, इसके साथ ही इसका मकसद लोगों को उनके बुनियादी अधिकारों और लोकतांत्रिक कर्तव्यों की याद दिलाना है।

उन्होंने कहा कि यह दिवस उस ‘सबसे काले समय’ को याद करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है जब 25 जून 1975 को तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने आपातकाल की घोषणा की थी, जिसके कारण नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ था।

धनखड़ ने कहा, ‘‘देश के नौ उच्च न्यायालयों ने एक स्वर में कहा था कि आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों पर रोक नहीं लगाई जा सकती। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इन नौ अदालतों के फैसलों को पलट दिया और कहा कि सरकार तय करेगी कि आपातकाल कब तक लागू रहेगा। इसलिए यह सुनिश्चित करने के लिए कि नई पीढ़ी इसे याद रखे, 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाया जाता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘हम संविधान के बारे में जितना अधिक जानेंगे, उतना ही यह हमें राष्ट्रवाद की ओर ले जाएगा। संविधान ने हमें मौलिक अधिकार दिए हैं। लेकिन इन मौलिक अधिकारों को पोषित किया जाना चाहिए।’’

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