जयपुर, 20 जनवरी वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने शुक्रवार को जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में कहा कि लेखन ने उन्हें अपने डर से बाहर निकलने में मदद की है और साथ ही उन्हें एक ऐसे मजबूत व्यक्तित्व में बदल दिया है, जो सत्ता में बैठे लोगों से सवाल कर सकता है।
'' दी फ्री वॉयस'', इश्क में शहर होना', देखते रहिए' और 'रवीशपंथी' जैसी किताबों के लेखक एवं पूर्व टीवी एंकर रवीश ने यहां 16वें जेएलएफ में ' द नेचर ऑफ फीयर' सत्र में यह बात कही ।
इस सवाल पर कि सत्तासीन लोगों से सवाल करने की हिम्मत उन्हें कहां से मिलती है, रवीश ने कहा कि एक वक्त ऐसा भी होता है, जब उनमें ऐसा करने का साहस नहीं होता।
उन्होंने कहा,'' दिमाग और शरीर पर कभी-कभी इतना प्रभाव पड़ता है कि मैं कई दफा छोड़ देता हूं और वह भी जब आप अकेले इसे कर रहे हैं । मैं पहले बहुत डरपोक इंसान हुआ करता था, यहां तक कि सड़क पार करने में डर लगता था । जो लोग मुझे उस समय से जानते हैं, वे हैरान होते हैं कि मैं इतना कैसे बोल लेता हूं ?''
संचालक सत्यानंद निरूपम के साथ बातचीत में रवीश ने कहा, '' बहुत से क्षण ऐसे होते हैं, जो आपको हिम्मत देते हैं । लेखन ने मुझे आगे बढ़ने में काफी मदद की है। जितना अधिक मैं लिखता हूं, उतना मुझे कम डर लगता है। जितना अधिक मैं बोलता हूं, उतना ही मेरा डर पहले से अधिक बेमानी होता जाता है। जब बोलने की प्रक्रिया खत्म होती है, तो डर फिर से सिर उठाने लगता है। यही कारण है कि मैंने अगले ही दिन लिखना शुरू कर देता हूं । जब आप लिखते हैं तो आप अपने आप से बातें करते हैं, कोई दर्शक नहीं होता। जितना अधिक आप खुद का सामना करते हैं, उतना ही आप खुद से लड़ेंगे ।''
रवीश ने यहां जेएलएफ के चारबाग में दर्शकों की भारी भीड़ से मुखातिब होते हुए ये सब बातें साझा कीं ।
जब उनसे सवाल किया गया कि वह डर को कैसे परिभाषित करेंगे, तो उन्होंने जवाब से बचते हुए चुटकी ली कि ऐसे सवालों के जवाब केवल बाबा रामदेव की किताबों में मिल सकते हैं। हालांकि, उन्होंने साथ ही कहा कि इसकी परिएं समय और संदर्भ से बंधी होती हैं।
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