देश की खबरें | कैदियों को सजा में छूट का लाभ देने के राज्य के अधिकार का मामला 7 सदस्यीय संविधान पीठ को भेजा गया

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नयी दिल्ली, 17 जुलई उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा प्रत्येक मामले के तथ्यों और सामग्री की छानबीन के बगैर ही संविधान के तहत एक समान नीति बनाकर राज्यों द्वारा कैदियों को सजा में छूट का लाभ देने से जुड़े मसले शुक्रवार को सात सदस्यीय संविधान पीठ को सौंप दिये।

कैदियों को सजा में छूट देने संबंधी कानूनी मुद्दा हत्या के मामले में दोषी प्यारे लाल की जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान पीठ के समक्ष यह सवाल उठा। पीठ को बताया गया कि प्यारे लाल को हरियाणा सरकार की नीति के तहत राज्यपाल ने संविधान के अनुच्छद 161 के तहत दोषी को दी गयी सजा में छूट का लाभ प्रदान करते हुये जेल से रिहा कर दिया है।

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राज्य सरकार ने 2019 में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर संविधान के अनुच्छेद 161 में प्रदत्त अधिकार का इस्तेमाल करते हुये कतिपय श्रेणी के कैदियों को सजा में छूट देने का फैसला लिया था। राज्य सरकार की नीति के तहत इसके दायरे में हत्या के जुर्म में उम्र कैद की सजा पाये ऐसे पुरूष कैदी भी थे जिनकी उम्र 75 साल से ज्यादा थी और वे अपनी सजा के आठ साल पूरा कर चुके थे।

हालांकि, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433ए के अनुसार उम्र कैद की सजा पाने वाले कैदी को जेल में 14 साल गुजारे बगैर इस तरह का छूट का लाभ नहीं मिल सकता है।

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न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित, न्यायमूर्ति एम एम शांतानागौडार और न्यायमूर्ति विनीत सरन की पीठ ने मारू नाम प्रकरण में पांच सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले का उल्लेख किया और कहा कि न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण्णा अय्यर ने बहुमत के फैसले में कहा था कि छूट का लाभ देने के लिये सरकार को प्रत्येक मामले में अलग अलग आदेश देने की जरूरत नहीं है लेकिन सामान्य आदेश ऐसे मामलों के समूह की पहचान करने के लिये पर्याप्त होना चाहिए और इससे पता चलना चाहिए कि पूरे समूह के मामले में विचार किया गया है।

पीठ ने कहा कि इस तरह के निष्कर्ष के आधार पर इसमें चर्चा है लेकिन 18 जुलाई, 1978 को संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल करके जारी आदेश कैदियों को छूट का लाभ देने का ऐसा तरीका है जो न्यायालय की मंजूरी के अनुरूप नहीं था।

न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित ने इस मामले में 1978 के फैसले की इस विसंगति का उल्लेख करते हुये इस मामले को वृहद पीठ को सौंपने का निर्णय सुनाया ताकि संविधान में प्रदत्त इस अधिकार का सही तरीके से इस्तेमाल की विवेचना हो जाये।

वृहद संविधान पीठ को अब यह विचार करना है कि क्या संविधान के अनुच्छेद161 के तहत प्रदत्त अधिकारों का इस्तेमाल करके ऐसी नीति तैयार की जा सकती है जिसमें ऐसे मानदंड बनाये जा सकते है जिसके बाद कार्यपालिका किसी भी मामले में तथ्यों और सामग्री को राज्यपाल के समक्ष पेश किये बगैर सजा में छूट का लाभ दे सकती है और क्या इस तरह की कवायद दंड प्र्रकिया संहिता की धारा 433ए के जरूरतों को दरकिनार कर सकती है।

पीठ ने कहा कि इसलिए हम रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि इस मामले कोप्रधान न्यायाधीश के समक्ष पेश करे ताकि वह इस मामले में उठाये गये सवालों पर विचार करने के लिये उचित पीठ का गठन कर सकें।

शीर्ष अदालत ने अपने 24 पेज के फैसले में दोषियों की सजा माफ करने के संबंध में राष्ट्रपति और राज्यपालों को संविधान में प्रदत्त अधिकारों का उल्लेख करने के साथ ही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433ए में प्रतिपादित मानदंडों का जिक्र करते हुये 1978 के संविधान पीठ के निर्णय पर विस्तार से चर्चा की है।

पीठ ने इसके साथ हरियाणासरकार की कतिपय वर्गो के दोषियों की सजा माफ करने संबंधी 2019 की नीति की विवेचना की।

फैसले में कहा गया है कि राज्य सरकार ने भी यह स्वीकार कियाहै कि किसी भी मामले में तथ्यों और दूसरी सामग्री को राज्यपाल के समक्ष नहीं रखा गया था और कैदियों को उसकी नीति के अनुसार ही सजामाफी का लाभ दिया गया था।

अनूप

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