जरुरी जानकारी | यूरोपीय संघ ने रोसनेफ्ट की भारतीय रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाए, तेल मूल्य सीमा घटाई

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नयी दिल्ली, 18 जुलाई यूरोपीय संघ ने शुक्रवार को रूस की दिग्गज ऊर्जा कंपनी रोसनेफ्ट की भारतीय तेल रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगा दिए और तेल मूल्य सीमा घटा दी। यह यूक्रेन में युद्ध को लेकर रूस के खिलाफ उठाए गए नए कदमों का हिस्सा है।

रूस के खिलाफ किए गए उन उपायों में बैंकिंग और रूसी कच्चे तेल से बने ईंधन पर प्रतिबंध शामिल हैं।

तेल मूल्य की कम सीमा इस समय 60 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल है। इसका अर्थ है कि रूस भारत जैसे खरीदारों को कम दरों पर अपना कच्चा तेल बेचने के लिए मजबूर होगा। रूसी तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार होने के नाते, भारत को इस कदम से लाभ होगा। इस समय भारत के कुल तेल आयात में रूसी कच्चे तेल का हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत है।

यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा, ''पहली बार, हम भारत में रोसनेफ्ट की सबसे बड़ी रिफाइनरी को नामित कर रहे हैं।''

रोसनेफ्ट की नायरा एनर्जी लिमिटेड में 49.13 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसे पहले एस्सार ऑयल लिमिटेड के नाम से जाना जाता था। नायरा गुजरात के वडिनार में दो करोड़ टन प्रति वर्ष की क्षमता वाली एक तेल रिफाइनरी और 6,750 से अधिक पेट्रोल पंपों का संचालन करती है।

एक निवेश समूह केसानी एंटरप्राइजेज कंपनी के पास नायरा में 49.13 प्रतिशत हिस्सेदारी है। केसानी का स्वामित्व रूस की यूनाइटेड कैपिटल पार्टनर्स (यूसीपी) और हारा कैपिटल सार्ल के पास है।

यूरोपीय संघ के प्रतिबंधों का मतलब है कि नायरा यूरोपीय देशों को पेट्रोल और डीजल जैसे ईंधन का निर्यात नहीं कर सकती।

कल्लास ने कहा, ''हमारे इरादे पक्के हैं। यूरोपीय संघ ने अभी-अभी रूस के खिलाफ अपने अब तक के सबसे कड़े प्रतिबंधों में से एक को मंजूरी दी है।''

उन्होंने कहा कि यूरोपीय संघ पूरी कोशिश कर रहा है कि रूस के रक्षा बजट में कटौती हो और रूसी बैंकों की वित्तपोषण तक पहुंच को सीमित किया जा रहा है।

ईयू के प्रतिबंधों में नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइनों पर प्रतिबंध और रूस द्वारा तेल निर्यात की कीमतों की निचली सीमा शामिल है।

इससे पहले जी7 देशों ने दिसंबर 2022 में तीसरे देशों को बेचे जाने वाले रूसी तेल पर 60 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल की मूल्य सीमा लगा दी थी। इस व्यवस्था के तहत, पश्चिमी बीमा और पोत परिवहन सेवाओं का उपयोग केवल तभी किया जा सकता है, जब तेल निर्धारित मूल्य पर या उससे कम पर बेचा जाए। इसका मकसद वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में स्थिरता बनाए रखते हुए रूस के तेल राजस्व को सीमित करना था।

हालांकि, कल्लास ने नई मूल्य सीमा का उल्लेख नहीं किया, लेकिन खबरों के मुताबिक शुरुआत में इसे 45 अमेरिकी डॉलर और 50 अमेरिकी डॉलर के बीच तय किया जाएगा। इसकी बाजार की स्थितियों के आधार पर साल में कम से कम दो बार समीक्षा की जाएगी।

कम मूल्य सीमा से भारत जैसे आयातक देशों को लाभ होगा, लेकिन अगर अमेरिका रूसी तेल खरीदने पर प्रतिबंध लगाता है, तो हालात जटिल हो सकते हैं। इस सप्ताह की शुरुआत में, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी थी कि अगर मास्को 50 दिनों के भीतर यूक्रेन के साथ शांति समझौता नहीं करेगा, तो रूसी निर्यातकों से सामान खरीदने वाले देशों को प्रतिबंधों या भारी शुल्क का सामना करना पड़ सकता है।

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