देश की खबरें | अदालत ने बैंक धोखाधड़ी मामले में ‘कुछ महत्वपूर्ण’ तथ्य छिपाने के लिए सीबीआई को फटकार लगाई

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नयी दिल्ली, 11 फरवरी दिल्ली की एक अदालत ने 2,435 करोड़ रुपये के बैंक धोखाधड़ी मामले में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को फटकार लगाते हुए उससे ‘‘कुछ महत्वपूर्ण तथ्य’’ छिपाने को ‘‘स्पष्ट अवज्ञा’’ का मामला बताया है।

विशेष न्यायाधीश संजीव अग्रवाल ने सीजी पावर एंड इंडस्ट्रियल सॉल्यूशंस और इसके पूर्व प्रवर्तक गौतम थापर के खिलाफ भारतीय स्टेट बैंक, औद्योगिक वित्त शाखा, मुंबई के साथ कथित धोखाधड़ी और 2,435 करोड़ रुपये के सार्वजनिक धन को नुकसान पहुंचाने के मामले में यह टिप्पणी की।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘जांच एजेंसी अदालत से कुछ तथ्य छिपा रही है। कुछ ऐसा है जिस पर वे गोपनीयता का पर्दा डालना चाहते हैं, ताकि सच्चाई कभी सामने न आए और वह फाइलों, यानी अपराध फाइल में ही दबी रहे।’’

अदालत ने 10 फरवरी को कहा कि 3 फरवरी को पारित आदेश में स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, सीबीआई उसके अवलोकन के लिए अपराध की फाइल पेश करने में विफल रही। न्यायाधीश ने कहा कि आदेश पारित करने के बाद, सीबीआई के पास इसपर गौर करने और इसे चुनौती देने के लिए पर्याप्त समय था।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इसलिए, आदेश का पालन न करना सीबीआई की ओर से स्पष्ट अवज्ञा और अड़ियल रवैया है। इससे यह भी जाहिर होता है कि वे अदालत के आदेश की परवाह नहीं करते या उसका पालन नहीं करते, जो गंभीर चिंता का विषय है। यह भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 की भावना के भी विपरीत है, जो निष्पक्ष जांच और उसके परिणामस्वरूप निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करता है।’’

अदालत ने सीबीआई की संबंधित शाखा के प्रमुख को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि जांच अधिकारी फाइल के साथ 21 फरवरी को उपस्थित हों।

न्यायाधीश ने कहा कि अदालत द्वारा मांगे गए स्पष्टीकरण के बिना वह ‘‘असमर्थ’’ हैं और इस बारे में कोई राय बनाने की स्थिति में नहीं हैं कि मामले में आगे जांच का आदेश दिया जाना चाहिए या नहीं। उन्होंने कहा कि इसके अलावा उन महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी गौर करना होगा जो एजेंसी ने शायद नजरअंदाज कर दिए हों।

अदालत ने कहा कि मुख्य और पूरक आरोपपत्र को पढ़ने पर प्रथम दृष्टया पता चलता है कि जांच ठीक से नहीं की गई, बल्कि लापरवाही से की गई। अदालत ने कहा कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से की जानी चाहिए।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘जांच पूरी होने के बाद, अंतिम रिपोर्ट अदालत में दाखिल की जाती है, तब अदालत को यह देखने का पूरा अधिकार है कि प्राथमिकी दर्ज होने से लेकर आरोपपत्र/अंतिम रिपोर्ट तैयार होने तक क्या हुआ, जिसमें अपराध फाइल भी शामिल है, जो जांच का हिस्सा है..। अपराध फाइल को छिपाने या पेश न करने से केवल यह संदेह बढ़ेगा कि जांच एजेंसी शायद कुछ छिपा रही है।’’

अदालत ने कहा कि यह एक बहुत बड़ा मामला है, जो देश के ईमानदार करदाताओं और राज्य के खजाने पर आघात पहुंचा रहा है।

आरोपी कंपनी की भारत, इंडोनेशिया और हंगरी में औद्योगिक और विद्युत प्रणाली इकाइयां हैं।

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