देश की खबरें | अदालत ने राउत के मानहानि मामले में राणे के बयान को दुर्भावना पूर्ण पाया, समन बरकरार रखा

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मुंबई, 17 जुलाई मुंबई की एक अदालत ने शिवसेना-उद्धव बालासाहेब ठाकरे (उबाठा) के नेता संजय राउत के खिलाफ दिये भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद नारायण राणे के ‘अस्पष्ट और निराधार’ बयानों को ‘दुर्भावनापूर्ण’ पाया और उनके विरुद्ध जारी समन को बरकरार रखा।

राउत ने राणे के खिलाफ मानहानि मुकदमा दायर किया था, जिसपर सुनवाई करते हुए अदालत ने यह टिप्पणी की।

अदालत ने पाया कि प्रथम दृष्टया राणे ने झूठे और सार्वजनिक बयान दिए थे, जो मानहानि कानून के तहत आरोप है।

राणे ने 15 जनवरी, 2023 को भांडुप में आयोजित कोंकण महोत्सव में राउत के बारे में कथित रूप से ‘दुर्भावनापूर्ण और झूठी’ टिप्पणी की थी, जिसके लिए शिवसेना उबाठा नेता ने भाजपा सांसद के खिलाफ आपराधिक मानहानि का मामला दायर किया था।

राणे ने कथित तौर पर कहा था कि राउत का नाम मतदाता सूची में नहीं है और जब वह (राणे) शिवसेना में थे, तो उन्होंने राउत को राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने में मदद की थी।

मझगांव की एक मजिस्ट्रेट अदालत ने शिकायत पर संज्ञान लेते हुए अप्रैल में भाजपा सांसद को समन जारी किया।

राणे ने सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों की विशेष अदालत में समन को चुनौती देते हुए कहा कि उनके खिलाफ मानहानि का कोई मामला नहीं बनता।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सत्यनारायण नवंदर ने बुधवार को एक आदेश में भाजपा नेता को जारी समन में कोई ‘अवैधता या अनौचित्य’ नहीं पाया।

अदालत ने कहा कि राउत ने 2002 की मतदाता सूची के एक अंश सहित दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए, जिस पर राणे ने कोई दलील नहीं दी, जिससे पुष्टि होती है कि राउत एक पंजीकृत मतदाता थे।

अदालत ने फैसला सुनाया, “प्रथम दृष्टया, याचिकाकर्ता के बयान झूठे और सार्वजनिक रूप से दिए गए थे, जिससे आरोप साबित होते हैं।”

अदालत ने कहा, “इसके अलावा ऐसा कहना है कि शिकायतकर्ता (राउत) ने धोखाधड़ी की है और उन्हें जेल जाना होगा, अस्पष्ट व निराधार है। ऐसा नहीं लगता कि यह बयान बगैर सोचे-समझे या पूरी सावधानी से दिया गया है।”

अदालत ने कहा कि ये बयान ‘बिना किसी सहायक सामग्री के दिए गए, जिससे द्वेष और शिकायतकर्ता (राउत) की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के इरादे का संकेत मिलता है।

भाजपा नेता ने अपनी दलीलों में उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों का जिक्र किया, लेकिन अदालत ने वर्तमान मामले को उन सबसे अलग करार दिया। अदालत ने कहा कि उन मामलों में शिकायतें राय-आधारित बयानों के आधार पर दर्ज की जाती थीं, जो सीधे तौर पर किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर हमला नहीं करती थीं।

अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोप ‘स्पष्ट रूप से झूठे हैं और शिकायतकर्ता की प्रतिष्ठा को कम करने के इरादे से लगाए गए थे’।

अदालत ने साथ ही कहा कि मजिस्ट्रेट ने रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री की सही ढंग से समीक्षा की और राणे को समन जारी किया। अदालत ने फैसला सुनाया कि विवादित आदेश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है और राणे की याचिका खारिज कर दी।

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