नयी दिल्ली, 11 जुलाई दिल्ली उच्च न्यायालय ने पति को आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में मृतक की पत्नी और उसके मायके के सदस्यों को बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है और कहा है कि आत्महत्या करने की तारीख तक उनकी ओर से उकसाने का कोई कार्य नहीं किया गया था।
उच्च न्यायालय ने कहा कि इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि पीड़ित ने किसी दिन निराशा में आत्महत्या नोट लिखा हो।
अदालत ने फैसले में लिखा, ‘‘सुसाइड नोट में न तो ऐसी कोई परिस्थिति बताई गई है, जिसे प्रतिवादी संख्या दो से छह (पत्नी और उसके मायके के परिजनों) की ओर से उकसावे के रूप में चिह्नित किया जा सके और न ही इसमें आत्महत्या के किसी भी कारण का खुलासा किया गया है।’’
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ द्वारा 10 जुलाई को दिए गए फैसले में कहा गया, ‘‘दहेज के झूठे मामले में फंसाने की लगातार धमकियों के सामान्य आरोप हैं। यह ऐसा मामला हो सकता है, जहां मृतक अपनी शादी से नाखुश और हताश था, लेकिन निश्चित रूप से, सुसाइड नोट या उसके माता-पिता की गवाही से किसी भी तरह के उकसावे का पता नहीं चलता है।’’
मृतक विजय सिंह के सुसाइड नोट का अवलोकन करने के बाद अदालत ने कहा कि जिस दिन उसने आत्महत्या की थी, उससे पहले उसकी पत्नी और उसके (पत्नी के) चार भाइयों की ओर से उकसावे की कोई कार्रवाई नहीं की गई थी।
विजय और उर्मिला की शादी अप्रैल 2008 में हुई थी और विजय ने मई 2010 में आत्महत्या कर ली थी।
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