देश की खबरें | प्रधान न्यायाधीश ने सेवानिवृत्त होने जा रहीं न्यायाधीश बेला त्रिवेदी की सराहना की

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नयी दिल्ली, 16 मई प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी आर गवई ने सेवानिवृत्त होने जा रहीं न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी की सराहना करते हुए शुक्रवार को कहा कि अधीनस्थ न्यायपालिका से लेकर उच्चतम न्यायालय तक का उनका सफर सराहनीय रहा।

न्यायमूर्ति गवई ने निवर्तमान न्यायाधीश की ‘‘निष्पक्षता, दृढ़ता, कड़ी मेहनत’’ के साथ ही ‘‘समर्पण और आध्यात्मिकता की भावना’’ की भी सराहना की।

पदोन्नति के बाद न्यायमूर्ति त्रिवेदी 31 अगस्त, 2021 को शीर्ष अदालत की न्यायाधीश बनी थीं।

उनके प्रयासों और प्रतिबद्धता की बार के सदस्यों, अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणि और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी सराहना की।

यद्यपि न्यायमूर्ति त्रिवेदी 9 जून 2025 को सेवानिवृत्त होंगी, लेकिन एक निजी प्रतिबद्धता के कारण शुक्रवार को उनका अंतिम दिन था।

परंपरा के अनुरूप, प्रधान न्यायाधीश गवई और न्यायमूर्ति त्रिवेदी तथा न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की सदस्यता वाली शीर्ष अदालत की एक रस्मी पीठ उनके सम्मान में एकत्र हुई।

हालांकि, प्रधान न्यायाधीश ने आज शाम उन्हें विदाई देने के लिए आधिकारिक विदाई समारोह आयोजित न करने के निर्णय के लिए उच्चतम न्यायालय बार एसोसिएशन (एससीबीए) की निंदा की।

परंपरा के अनुसार, एससीबीए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए विदाई समारोह आयोजित करती है और न्यायमूर्ति त्रिवेदी के मामले में एक असाधारण निर्णय लिया गया।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘न्यायाधीश विभिन्न प्रकार के होते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो राहत देते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो राहत नहीं देते। न्यायाधीश अंततः मनुष्य ही होते हैं। हर किसी के अलग-अलग विचार होते हैं। हम सभी एक परिवार के रूप में एक साथ हो सकते हैं, और इसलिए मैं लोगों का आभारी हूं, और निश्चित रूप से इसलिए भी कि वे दोनों (एससीबीए अध्यक्ष कपिल सिब्बल और अन्य पदाधिकारी) यहां मौजूद हैं।’’

उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन एसोसिएशन (एससीबीए) द्वारा अपनाए गए रुख की मैं खुले तौर पर निंदा करता हूं, क्योंकि मैं स्पष्ट और सीधी बात कहने में विश्वास करता हूं। एसोसिएशन द्वारा ऐसा रुख नहीं अपनाया जाना चाहिए था, और इसलिए मैं खुले तौर पर इसकी सराहना करता हूं कि बार निकाय के प्रस्ताव के बावजूद वे (सिब्बल और अन्य पदाधिकारी) यहां हैं।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि प्रस्ताव के बावजूद, एससीबीए पदाधिकारियों की उपस्थिति ने ‘‘परंपराओं और न्यायपालिका के प्रति सम्मान को मतभेदों से परे’’ पुनः स्थापित किया।

न्यायमूर्ति मसीह ने भी ऐसी ही भावना व्यक्त की।

उन्होंने कहा, ‘‘यह अजीब बात है, जैसा कि प्रधान न्यायाधीश पहले ही कह चुके हैं, मुझे दुख है, लेकिन मैं यह जरूर कहना चाहूंगा कि परंपराओं का पालन किया जाना चाहिए और उनका सम्मान किया जाना चाहिए। मुझे यकीन है कि अच्छी परंपराएं हमेशा जारी रहनी चाहिए।’’

इसके बाद न्यायमूर्ति गवई ने न्यायमूर्ति त्रिवेदी की करियर संबंधी यात्रा का वर्णन किया तथा बताया कि उन्हें अपने न्यायाधीश पिता से प्रारंभिक प्रेरणा मिली और लंबा सफर तय करते हुए देश के उच्चतम न्यायालय में उनकी पदोन्नति हुई।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘उनकी यात्रा दृढ़ता, निष्ठा और समर्पण की एक सम्मोहक कहानी है। जिला न्यायपालिका और प्रशासनिक भूमिकाओं में उनके समृद्ध अनुभव ने उन्हें एक विशिष्ट बढ़त दी। न्यायिक अधिकारी, विधि अधिकारी या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में, उन्होंने असाधारण कानूनी अंतर्दृष्टि, निष्पक्षता और प्रबंधन कौशल का प्रदर्शन किया।’’

प्रधान न्यायाधीश ने गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए उनकी प्रशंसा की तथा न्यायिक निष्ठा बनाए रखने के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की भी सराहना की।

चुनौतीपूर्ण व्यक्तिगत समस्याओं के दौरान उनकी अटूट प्रतिबद्धता को याद करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘यहां तक ​​कि जब उनके पिता बीमार थे, तब भी वह सप्ताहांत में अहमदाबाद जाती थीं और सोमवार की सुबह अदालत में वापस आ जाती थीं।’’

प्रधान न्यायाधीश ने उनके तेजी से बढ़ते कद का जिक्र करते हुए कहा, ‘‘वह उच्चतम न्यायालय की एकमात्र कार्यरत न्यायाधीश हैं, जो जिला न्यायपालिका से आगे बढ़ी हैं, जो एक दुर्लभ और प्रेरणादायक उपलब्धि है। अनुसूचित जातियों के बीच उप-वर्गीकरण पर हाल ही में सात न्यायाधीशों की पीठ के फैसले में उनकी असहमतिपूर्ण राय ने उनकी स्वतंत्र सोच और साहस को प्रदर्शित किया है।’’

इस अवसर पर न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने कहा, ‘‘30 वर्षों से मैं केवल अपने निर्णयों के माध्यम से ही बोलती रही हूं। आज मैं यह घोषणा करना चाहती हूं कि इस लंबी यात्रा का अंतिम चरण समाप्त हो गया है।’’

उन्होंने अधिकतर अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने की बात कही तथा संस्था में ईमानदारी और निष्पक्षता से सेवा करने पर संतोष व्यक्त किया।

न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने न्यायिक बहुलवाद के मूल्य पर जोर दिया, जो लोकतांत्रिक आदर्शों को प्रतिबिंबित करता है, भले ही इससे कभी-कभी कानूनी तर्क में मतभेद पैदा हो।

उन्होंने कहा, ‘‘अंततः, सबसे महत्वपूर्ण बात संस्थागत अखंडता है, जो राष्ट्रीय अखंडता को कायम रखती है।’’

न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने अपने संबोधन का समापन अपने परिवार, सहकर्मियों, कर्मचारियों और संस्थान के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए किया।

उन्होंने कहा, ‘‘दीवानी अदालत से उच्चतम न्यायालय तक की यात्रा सहज, संतुष्टिदायक और सबसे बढ़कर मेरी अंतरात्मा द्वारा निर्देशित रही। मैं अपार संतुष्टि और कृतज्ञता के साथ यहां से जा रही हूं।’’

मेहता ने ‘‘संविधान के शब्द’’ का आह्वान करने के लिए उनकी सराहना की।

उन्होंने कहा, ‘‘आप जिस भी अदालत में गई हैं, हर अदालत में एक बात समान है जो हमेशा मौजूद रहती है और हम सभी जानते हैं कि कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जो महसूस करते हैं कि मेरे शब्द कानून के अंतिम शब्द होने चाहिए। आपकी अदालत में ऐसा कभी नहीं हुआ। अंतिम शब्द कानून और संविधान के शब्द थे, भले ही इससे कुछ लोग नाराज हुए हों।’’

वरिष्ठ अधिवक्ता सिब्बल ने न्यायमूर्ति त्रिवेदी की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह उच्चतम न्यायालय के सात दशक से अधिक पुराने इतिहास में शीर्ष अदालत में पदोन्नत होने वाली कुछ महिला न्यायाधीशों में से एक हैं।

उन्होंने कहा, ‘‘इस देश के 75 वर्षों के भीतर, इसका मतलब है कि हर सात साल में एक महिला न्यायाधीश की नियुक्ति हुई है। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।’’

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने उन्हें ‘‘एक महान एवं प्रतिष्ठित न्यायाधीश’’ करार दिया।

उत्तरी गुजरात के पाटन में 10 जून 1960 को जन्मीं न्यायमूर्ति त्रिवेदी को 10 जुलाई 1995 को अहमदाबाद में दीवानी एवं सत्र न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया।

यह सुखद संयोग था कि जब उनकी नियुक्ति हुई तो उनके पिता पहले से ही शहर के दीवानी एवं सत्र न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थे।

उन्हें 17 फरवरी 2011 को गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया और बाद में उनका स्थानांतरण राजस्थान उच्च न्यायालय में हो गया।

फरवरी 2016 में उन्हें गुजरात के मूल उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया और शीर्ष अदालत में पदोन्नति होने तक वह वहीं रहीं।

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