देश की खबरें | ‘स्वास्थ्य दूत’ : निकोबार में ‘मेडिकल इमरजेंसी’ से निपटने की अनोखी पहल
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(सुजीत नाथ)
पोर्ट ब्लेयर, 15 जनवरी निकोबार जिला प्रशासन ने इस सुदूर द्वीप के बाशिंदों को ‘मेडिकल इमरजेंसी’ (चिकित्सकीय आपात स्थिति) से निपटने का प्रशिक्षण देने के लिए एक अनोखी पहल शुरू की है।
‘स्वास्थ्य दूत’ परियोजना एक समुदाय आधारित स्वयंसेवी कार्यक्रम है। ग्रेट निकोबार के सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (एसडीएम) नितिन शाक्य ने पिछले साल अक्टूबर में देर रात ‘मेडिकल इमरजेंसी’ से संबंधित एक फोन कॉल आने के बाद इस परियोजना की शुरुआत की।
कॉल करने वाला व्यक्ति एक सरकारी कर्मचारी था। उसने एसडीएम से कहा कि सुदूर कैंपबेल बे के माकाचुआ गांव में एक व्यक्ति की हृदयगति रुकने संबंधी आपात संदेश आया है। कर्मचारी ने बताया कि यह संदेश पुलिस की रेडियो संचार प्रणाली पर प्राप्त हुआ है, जो इस सुदूर गांव में ग्रामीणों से संचार का एकमात्र जरिया है।
इंडोनेशिया से 90 समुद्री मील (लगभग 166.8 किलोमीटर) की दूरी पर स्थित माकाचुआ एक सुदूर आदिवासी बहुल द्वीप है। कैंपबेल बे से स्पीड बोट के जरिये यहां पहुंचने में लगभग चार से पांच घंटे का समय लगता है।
एक अधिकारी ने कहा कि अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस किसी शहर या कस्बे में इस तरह की ‘मेडिकल इमरजेंसी’ से आसानी से निपटा जा सकता था, लेकिन माकाचुआ जैसे सुदूर गांवों में ऐसे मामलों में जवाबी कार्रवाई करना पूरी तरह से एक अलग चुनौती था।
अधिकारी के मुताबिक, आपात कॉल के बाद सहायक आयुक्त का कार्यालय हरकत में आ गया और उसके पास जो भी संसाधन थे, उन्हें जुटाकर माकाचुआ भेजा, जिससे बड़ी मुश्किल से बीमार व्यक्ति की जान बचाई जा सकी।
अधिकारी ने बताया कि मरीज को तत्काल ‘कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन’ (सीपीआर) दिए जाने की जरूरत थी, लेकिन माकाचुआ के ग्रामीण न तो इस तकनीक से वाकिफ थे और न ही उन्हें ऐसे मामलों से निपटने की कला आती थी।
‘कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन’ एक जीवनरक्षक तकनीक है, जिसका इस्तेमाल दिल का दौरा पड़ने या हृदयगति अथवा श्वास गति रुकने जैसे आपात मामलों में मरीजों की जान बचाने के लिए किया जाता है। इसके तहत, मरीज की छाती दबाकर और मुंह से मुंह के जरिये श्वास देकर उसके शरीर में रक्त और ऑक्सीजन का प्रवाह बहाल किया जाता है, जिससे उसके मस्तिष्क और अन्य महत्वपूर्ण अंगों को जीवित रखने में मदद मिलती है।
एमबीबीएस की डिग्री रखने वाले शाक्य ने ‘पीटीआई-’ से कहा, “इस मामले के सामने आने के बाद मैंने ‘स्वास्थ्य दूतों’ की एक फौज तैयार करने का विचार पेश किया, ताकि ग्रेट निकोबार में इस तरह के सुदूर इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत किया जा सके।”
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