देश की खबरें | निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा नफरती भाषण के मामले में कड़ी कार्रवाई आवश्यक : दिल्ली उच्च न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के धर्म व जाति के आधार पर भड़काऊ भाषण संवैधानिक लोकाचार को ठेस पहुंचाने के साथ ही संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं, इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से कड़ी कार्रवाई की जरूरत है।

नयी दिल्ली, 13 जून दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों, राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के धर्म व जाति के आधार पर भड़काऊ भाषण संवैधानिक लोकाचार को ठेस पहुंचाने के साथ ही संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं, इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से कड़ी कार्रवाई की जरूरत है।

न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह ने इस बात का भी उल्लेख किया कि नफरत भरे भाषणों के ऐसे भी उदाहरण हैं, जिसके कारण देश में पलायन के हालत भी बने हैं। अदालत ने कहा कि बड़े नेताओं और उच्च पदों पर आसीन लोगों को पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी भरा आचरण करना चाहिए।

अदालत ने कहा कि यह उचित नहीं है कि नेता ऐसे कृत्य करें या भाषण दें, जो समुदायों के बीच दरार और तनाव पैदा करते हैं और समाज में सामाजिक ताने-बाने के लिए हानिकारक है।

न्यायाधीश ने कहा कि लोकतंत्र में निर्वाचित नेता न केवल अपने मतदाताओं बल्कि पूरे समाज, राष्ट्र और संविधान के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं।

अदालत ने कहा, ‘‘देश के विभिन्न भागों में जनसांख्यिकीय संरचना के आधार पर विशिष्ट समुदायों के लोगों के खिलाफ नफरती भाषण के कई उदाहरण हैं और ऐसे मामले जारी हैं। इस तरह के नफरती/भड़काऊ भाषणों के बाद जनसांख्यिकीय बदलाव के भी उदाहरण हैं, जिसमें कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन एक प्रमुख उदाहरण है।’’

अदालत ने यह टिप्पणी मार्क्सवादी नेताओं वृंदा करात और के.एम. तिवारी की उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और भाजपा सांसद प्रवेश वर्मा के खिलाफ उनके कथित नफरती भाषणों के लिए प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश देने से निचली अदालत के इनकार को चुनौती दी गई थी।

माकपा नेताओं ने यहां शाहीन बाग में संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) विरोधी प्रदर्शन को लेकर दोनों भाजपा नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध किया था।

अदालत ने निचली अदालत के आदेश में इस आधार पर हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया कि कानून के तहत वर्तमान तथ्यों में प्राथमिकी दर्ज करने के लिए सक्षम प्राधिकारी से अपेक्षित मंजूरी प्राप्त करना आवश्यक है।

अदालत ने अपने 66 पन्नों के आदेश में कहा कि नफरती भाषण विशिष्ट समुदायों के सदस्यों के खिलाफ हिंसा और आक्रोश की भावनाओं को भड़काते हैं, जिससे उन समुदायों के लोगों के मन में भय और असुरक्षा की भावना पैदा होती है।

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