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सबरीमला: पुनर्विचार याचिकाओं में विधि के प्रश्न को बड़ी पीठ को भेजने में कोई बाधा नहीं: न्यायालय

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली नौ सदसयीय संविधान पीठ ने 10 फरवरी को कहा था कि शीर्ष अदालत पुनर्विचार याचिका में उठे कानूनी मुद्दों को वृहद पीठ को सौंप सकती है। इस संविधान पीठ ने सोमवार को इस बारे में अपने इस निर्णय के विस्तृत कारणों की जानकारी दी।

सबरीमला: पुनर्विचार याचिकाओं में विधि के प्रश्न को बड़ी पीठ को भेजने में कोई बाधा नहीं: न्यायालय
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नयी दिल्ली, 11 मई उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के मामले में पुनर्विचार अधिकार क्षेत्र के तहत उसकी पांच न्यायाधीशों की पीठ के पास अपनी सीमित शक्ति का इस्तेमाल करते हुए विधि के प्रश्न को वृहद पीठ को सौंपने का अधिकार था। न्यायालय ने कहा कि पुनर्विचार याचिकाओं में कानूनी सवालों को वृहद पीठ को सौंपने के लिये शीर्ष अदालत के विशेषाधिकार के इस्तेमाल में कोई बाधा नहीं है।

प्रधान न्यायाधीश एस ए बोबडे की अध्यक्षता वाली नौ सदसयीय संविधान पीठ ने 10 फरवरी को कहा था कि शीर्ष अदालत पुनर्विचार याचिका में उठे कानूनी मुद्दों को वृहद पीठ को सौंप सकती है। इस संविधान पीठ ने सोमवार को इस बारे में अपने इस निर्णय के विस्तृत कारणों की जानकारी दी।

इस संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति आर भानुमति, न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति एम एम शांतानगौडर, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी, न्यायमूर्ति बी आर गवई और न्यायमूर्ति सूर्य कांत शामिल हैं। संविधान पीठ ने कहा कि ये पुनर्विचार याचिकायें और इनसे उपजे सवाल विचारयोग्य हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘यह स्पष्ट है कि दीवानी और फौजदारी कार्यवाही से इतर अन्य कार्यवाही से संबंधित फैसले और आदेशों पर पुनर्विचार याचिकाओं में इस न्यायालय के अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल में कोई बंदिश नहीं है।’’

पीठ ने कहा कि उच्चतम न्यायालय के नियम, 2013 को पढ़ने से स्पष्ट है कि दीवानी या फौजदारी कार्यवाही से इतर किसी अन्य तरह की कार्यवाही के फैसले या आदेश पर पुनर्विचार के लिये दायर याचिकाओं में इस न्यायालय के अधिकार के इस्तेमाल की कोई सीमा नहीं है।

पीठ ने अनेक पक्षकारों की इस दलील को अस्वीकार कर दिया कि लंबित पुनर्विचार याचिका में वृहद पीठ के पास कोई मामला नहीं भेजा जा सकता और ऐसा सिर्फ पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसले के बाद ही किया जा सकता है।

शीर्ष अदालत ने 10 फरवरी को इन आपत्तियों को अस्वीकार कर दिया था कि पांच सदस्यीय पीठ द्वारा 3:2 के बहुत से 14 नवंबर, 2019 को सबरीमला मामले में सुनाये गये 2018 के फैसले पर पुनर्विचार के लिये दायर याचिकाओं पर निर्णय के बगैर ही इसे वृहद पीठ को सौंपना गलत था। इस पीठ ने सितंबर, 2018 को 4:1 के बहुमत फैसले के तहत न्यायालय ने सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति प्रदान की थी। इस निर्णय से पहले सबरीमला मंदिर में 10 से 50 साल की आयु की महिलाओं का प्रवेश वर्जित था।

इस संविधान ने विभिन्न धर्मो में धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे के बारे मे सात सवाल तैयार किये थे और स्पष्ट किया था कि वृहद पीठ इन सवालों को कम या ज्यादा कर सकती है।

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(The above story first appeared on LatestLY on May 11, 2020 08:47 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).