देश की खबरें | मादक पदार्थ की परिभाषा के विस्तार के खिलाफ याचिका पर केंद्र से मांगा जवाब

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस) के तहत मादक पदार्थ की परिभाषा को विस्तार देने के फैसले के खिलाफ याचिका पर बुधवार को केंद्र सरकार से जवाब मांगा।

नयी दिल्ली, 19 जनवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम (एनडीपीएस) के तहत मादक पदार्थ की परि को विस्तार देने के फैसले के खिलाफ याचिका पर बुधवार को केंद्र सरकार से जवाब मांगा।

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और न्यायमूर्ति ज्योति सिंह की पीठ ने इस याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया और उसे 28 फरवरी तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। इस मामले में अब 28 फरवरी को आगे सुनवाई होगी।

केरल निवासी याचिकाकर्ता राजीव टीएम ने एनडीपीएस अधिनियम के तहत वित्त मंत्रालय की ओर से साल 2001 और 2009 में जारी दो अधिसूचनाओं को चुनौती दी है। उनकी दलील है कि दोनों अधिसूचनाओं में प्रदत्त अधिकारों से ज्यादा प्रावधान किए गए हैं और ये कानून के विपरीत हैं।

राजीव टीएम ने दावा किया है कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 2 (सात ए) और धारा 2 (23 ए) के तहत जारी दोनों अधिसूचनाओं से एक औषधि का निर्माण मादक पदार्थ के उत्पादन की तरह दंडनीय होगा और इसका नतीजा अपराध की एक नई श्रेणी स्थापित होने के रूप में सामने आएगा।

याचिकाकर्ता की तरफ से पेश अधिवक्ता जे सई दीपक ने कहा, ‘इन अधिसूचनाओं में किए गए वर्गीकरण और एनडीपीएस अधिनियम के उद्देश्य के बीच कोई तर्कसंगत संबंध नहीं है। लिहाजा, इन्हें जारी करना संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन है।’

सई ने कहा, ‘दोनों अधिसूचनाओं के तहत मादक पदार्थ की मात्रा और उसका इस्तेमाल करने वाले लोगों का वर्गीकरण पदार्थ के कुल माप (मादक और तटस्थ पदार्थ के माप सहित) के आधार पर करने की कोशिश की गई है, न कि सिर्फ मादक पदार्थ के माप की बुनियाद पर, जो इस बात का बेहतर संकेतक है कि संबंधित मात्रा व्यावसायिक इस्तेमाल के मकसद से ली गई है या फिर इसका उद्देश्य निजी उपयोग है।’

याचिका में कहा गया है कि दोनों अधिसूचनाओं के लागू होने पर चार ग्राम हेरोइन को छोटी मात्रा माना जाएगा, लेकिन अगर ड्रग्स की लत का शिकार कोई व्यक्ति इसे 50 किलो चीनी पाउडर के साथ मिला देगा तो यही मात्रा व्यावसायिक मात्रा बन जाएगी, जिसके 20 साल तक की जेल की सजा जैसे घातक नतीजे हो सकते हैं।

याचिका में दोनों अधिसूचनाओं को रद्द करने का अनुरोध किया गया है। याचिका के अनुसार, ‘‘इन अधिसूचनाओं का क्रियान्वयन एक ऐसी स्थिति पैदा करता है, जिसमें नशे की लत से जूझ रहे लोगों के उपचार के लिए एक सुधारात्मक दृष्टिकोण अपना कर सजा को युक्तिसंगत बनाने के उद्देश्य के बीच कोई तर्कसंगत संबंध नहीं होगा। प्रस्तावित वर्गीकरण ड्रग्स तस्करों और ड्रग्स की लत के शिकार लोगों को तब तक एक ही वर्ग में रखता है, जब तक वे उसमें तस्कर से ज्यादा मात्रा में तटस्थ पदार्थ नहीं मिलाते।’’

याचिका में कहा गया है कि ये अधिसूचनाएं अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत आजादी की सुरक्षा) का भी उल्लंघन करती हैं, क्योंकि इनके जरिये पर्याप्त तटस्थ सामग्री के साथ मिश्रित होने पर मादक पदार्थ की मौजूदगी को अधिक दंडनीय बनाया गया है।

याचिका में इन अधिसूचनाओं को गलत बताते हुए तर्क दिया गया है कि एनडीपीएस अधिनियम में मात्रा निर्धारित करने के लिए स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ के केवल शुद्ध माप पर विचार करने की जरूरत है।

याचिकाकर्ता एनडीपीएस अधिनियम के तहत दर्ज एक मामले में मुकदमे का सामना कर रहा है। वह फिलहाल जमानत पर जेल से बाहर है।

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