जरुरी जानकारी | आरबीआई-सरकार का तनाव राष्ट्रीयकृत व्यवस्था के बाजार उन्मुखी होने के कारण : आचार्य
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. सरकार और आरबीआई के बीच तनाव पनपने की वजह देश का राष्ट्रीयकृत व्यवस्था से बाजार उन्मुखी अर्थव्यवस्था की ओर मुड़ना है। केंद्रीय बैंक की स्वायत्ता से जुड़े सवालों के बारे में यह बात भारतीय रिवर्ज बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कही।
मु्ंबई, दो अगस्त सरकार और आरबीआई के बीच तनाव पनपने की वजह देश का राष्ट्रीयकृत व्यवस्था से बाजार उन्मुखी अर्थव्यवस्था की ओर मुड़ना है। केंद्रीय बैंक की स्वायत्ता से जुड़े सवालों के बारे में यह बात भारतीय रिवर्ज बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कही।
आचार्य पिछले साल के अंत में अपना कार्यकाल समाप्त होने से पहले आरबीआई के डिप्टी गवर्नर के पद से इस्तीफा देकर अमेरिका चले गए थे। वह वहां अध्यापन कार्य कर रहे हैं।
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एस.पी.जैन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च के एक कार्यक्रम में आचार्य ने कहा, ‘‘भारत उनके दिल में बसता है और वह भविष्य में भी देश की सेवा के लिए तैयार हैं।’’
हाल में केंद्रीय बैंक के कुछ गवर्नरों ने आरबीआई की स्वायत्ता को लेकर अपनी आवाज उठायी है। यहां तक कि यह मतभेद मौद्रिक नीति के लिए नीतिगत दरों को तय करने से लेकर कई अन्य मुद्दों पर सामने आते रहे हैं।
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आचार्य ने कहा कि आरबीआई और सरकार के बीच मतभेद के पीछे एक वजह देश में वित्तीय बचतों में गिरावट भी है।
केंद्रीय बैंक की स्वायत्ता से जुड़े एक प्रश्न के जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘ पूर्व गवर्नरों और डिप्टी गवर्नरा के साथ बातचीत के बाद मै एक निष्कर्ष पर पहुंचा कि अब इस तरह के दबाव एवं मतभेद (सरकार और आरबीआई के बीच) ज्यादा उभरने की एक बड़ी वजह देश का राष्ट्रीयकृत अर्थव्यवस्था से बाजार उन्मुखी अर्थव्यवस्था की ओर मुड़ना है।’’
आरबीआई के भूतपूर्व गवर्नर वाई.वी.रेड्डी का उदाहरण देते हुए आचार्य ने कहा कि पुराने दिनों में केंद्र सरकार, रिजर्व बैंक औरसरकारी बैंकों ने ‘अविभाजित हिंदू परिवार’ (एचयूएफ) की व्यवस्था तैयार की जहां हितधारकों की सभी जरूरतों का आसानी से प्रबंध हो जाता था।
आचार्य ने कहा कि अब यह एचयूएफ व्यवस्था अर्थव्यवस्था के लिए बहुत मायने नहीं रखती। अब बाजार है, निजी क्षेत्र की कंपनियां हैं जो घरेलू और वैश्विक दोनों स्तर पर कर्ज उठा रही हैं।
उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था के इस चारित्रिक बदलाव के अलावा देश के लागों की वित्तीय बचत भी पिछले एक दशक में कम हुई है इसने संसाधनों का अभाव बढ़ा है।
उन्होंने आगे समझाया कि वृद्धि गिरी है, राजकोष का हिसाब-किताब मजबूत होने के बजाय दबाव में है। वहीं घरेलू बचतों पर ब्याज की दर कम हो रही है।
आचार्य ने कहा कि इन सब बाताों का पुरानी व्यवस्था पर दबाव पड़ रहा है । सरकार को उधार लेने की जरूरत है। पह अपने खर्चों को इधर या उधर से कम करना चाहती है।सभी चाहते हैं कि केंद्रीय बैंक समायोजन करने वाला रुख अपनाए, भले भी उसे किसी भी तरह की नीति अपनानी हो।
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