देश की खबरें | प्रमुख हस्तियों ने सावरकर को पाठ्यक्रम में शामिल करने के डीयू के फैसले का समर्थन किया
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. पूर्व न्यायाधीशों, नौकरशाहों, राजनयिकों और सैन्य अधिकारियों के एक समूह ने राजनीति शास्त्र के पाठ्यक्रम में हिंदूवादी विचारक वी डी सावरकर को शामिल करने के दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के फैसले का बुधवार को समर्थन किया।
नयी दिल्ली, सात जून पूर्व न्यायाधीशों, नौकरशाहों, राजनयिकों और सैन्य अधिकारियों के एक समूह ने राजनीति शास्त्र के पाठ्यक्रम में हिंदूवादी विचारक वी डी सावरकर को शामिल करने के दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के फैसले का बुधवार को समर्थन किया।
समूह ने तर्क दिया कि भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास के निष्पक्ष वर्णन के लिए यह आवश्यक है।
समूह ने एक बयान जारी कर ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा...’ के रचयिता शायर मोहम्मद इकबाल को राजनीति शास्त्र के पाठ्यक्रम से हटाने के डीयू के फैसले का भी समर्थन किया। उसने कहा कि मोहम्मद इकबाल का लेखन अलग मुस्लिम राष्ट्र के विचार से जुड़ा था, जिसकी वजह से आगे चलकर ‘भारत के विभाजन की त्रासदी सामने आई।’
पूर्व विदेश सचिव शशांक और उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों-न्यायमूर्ति एस एन ढींगरा, न्यायमूर्ति एम सी गर्ग व न्यायमूर्ति आर एस राठौर सहित 123 प्रमुख हस्तियों द्वारा जारी बयान में कहा गया है, “भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र कराने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाली कई ऐतिहासिक हस्तियों के साथ घोर अन्याय किया गया।”
इसमें कहा गया है, “यह विशेष रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है कि सावरकर के योगदान और दर्शन को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने से पहले तक, कांग्रेस-वामपंथी प्रभाव वाले विश्वविद्यालयों ने जानबूझकर हमारी महान मातृभूमि के लिए उनके योगदान और विचारों की अनदेखी की।”
बयान के मुताबिक, सावरकर को उनकी उल्लेखनीय रचना ‘हिंदुत्व : हू इज अ हिंदू’ में ‘हिंदुत्व’ की विचारधारा को स्पष्ट रूप से बयां करने के लिए ‘हिंदुत्व का पितामह’ कहा जाता था।
इसमें कहा गया है, “सावरकर ने एक साझा सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान के तहत विविध समुदायों को एकजुट करते हुए ‘हिंदुत्व’ का प्रचार-प्रसार एक भू-राजनीतिक अवधारणा के रूप में किया।”
बयान के अनुसार, सावरकर ने साथ ही साथ दलित अधिकारों के लिए आवाज उठाई और जाति प्रथा के उन्मूलन तथा सामाजिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में काम किया।
इसमें कहा गया है कि एक राष्ट्र के रूप में भारत को लेकर सावरकर का विचार ‘अखंड भारत’ की विचारधारा के केंद्र में था।
बयान के मुताबिक, “आजादी, समाज सुधार और राष्ट्रीय एकता को लेकर सावरकर के विचार उन्हें भारतीय इतिहास की सराहनीय हस्ती बनाते हैं। सावरकर की राजनीतिक विचारधारा का अध्ययन कर छात्र भारत के राष्ट्रवादी आंदोलन और उसके बाद के घटनाक्रमों को आकार देने वाले कारकों के बारे में जानकारी हासिल कर सकेंगे।”
बयान में मोहम्मद इकबाल को एक ‘विभाजनकारी व्यक्ति’ करार दिया है, जिसने देश के बंटवारे के बीज बोए।
इसमें कहा गया है, “तत्कालीन मुस्लिम लीग के अध्यक्ष के तौर पर इकबाल ने अलग मुस्लिम राष्ट्र की वकालत की। ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा...’ लिखने वाले इकबाल ने इस्लामिक खिलाफत की बात की, इस्लामिक उम्मा की सिफारिश की और ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तान हमारा...’ को बदलकर ‘चीन-ओ-अरब हमारा, हिंदोस्तां हमारा, मुस्लिम है हम, वतन है सारा जहां हमारा’ कर दिया।”
बयान में कहा गया है, “द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की इस अवधारणा ने भारत के विभाजन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप भारत के पूर्व और पश्चिम में लाखों विस्थापितों को आघात और तकलीफ झेलनी पड़ी।”
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