देश की खबरें | अच्छे कानून के सिद्धांतों में समाज की बदलती जरूरतों के अनुरूप विकास शामिल : न्यायमूर्ति संजीव खन्ना

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नयी दिल्ली, 26 अगस्त उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश संजीव खन्ना ने शनिवार को कहा कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) जैसे अच्छे कानून की विशेषताओं में इसकी व्यावहारिकता, निश्चितता, कार्यान्वयन में निरंतरता के साथ-साथ समाज की बदलती मांगों को पूरा करने के लिए इसका उत्तरोत्तर विकास शामिल है।

न्यायमूर्ति खन्ना ने एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम के दौरान पहले के कंपनी कानूनों की तुलना में आईबीसी के अच्छे परिणामों की वजहों को भी रेखांकित किया। न्यायमूर्ति खन्ना मौजूदा प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की सेवानिवृत्ति के बाद प्रधान न्यायाधीश बनने वाले हैं।

मौजूदा समय में उच्चतम न्यायालय के तीसरे वरिष्ठतम न्यायाधीश ने आईबीसी में ‘‘चेतावनी संकेतों’’ को भी चिह्नित किया और इस बारे में भी ध्यान देने की आवश्यकता जताई।

न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा, ‘‘कानून वास्तव में विवादों को सुलझाने के लिए हैं, न कि खुद विवादित बनने के लिए। कानूनी विशेषज्ञों के लिए न कानून लिखे जाते हैं न बनाए जाते हैं। यह उनकी अंतर्निहित प्रकृति है कि कानून हर किसी से संबंधित होते हैं और हमारे दैनिक जीवन में लगभग हर चीज पर लागू होते हैं तथा इस प्रकार, उन्हें आम लोगों के लिए कभी भी रहस्य नहीं रहना चाहिए।’’

हालांकि, जब वाणिज्यिक और आर्थिक कानूनों की बात सामने आई तो परिदृश्य अलग होता था, क्योंकि उन्हें "व्याख्यात्मक कौशल" की आवश्यकता होती थी और उन्हें "जटिल" माना जाता था।

न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा, ‘‘इसका एक कारण यह है कि वाणिज्यिक कानून व्यापक हैं और अनुबंध, बिक्री, कॉर्पोरेट प्रशासन, उपभोक्ता संरक्षण, कर, बैंकिंग एवं वित्त जैसे कई क्षेत्रों को कवर करते हैं।"

न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा, ‘‘इसलिए एक व्यापक संहिता तैयार करना मुश्किल था, जो वाणिज्यिक कानून में शामिल सभी पहलुओं को पर्याप्त और सटीक रूप से प्रतिबिंबित करता हो।’’

एक अच्छे कानून के सामान्य सिद्धांतों के बारे में उन्होंने कहा कि इसे साध्य बनाने के लिए सबसे पहले इसका व्यावहारिक होना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि एक अच्छे कानून का दूसरा पहलू इसका अनुपालन सुनिश्चित करना है और इसके लिए इसे "सरल और स्पष्ट" होना आवश्यक है।

न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा, "तीसरा पहलू कुछ हद तक विरोधाभासी है। कार्यान्वयन में निरंतरता और स्थिरता होनी चाहिए, साथ ही, समाज की जरूरतों को पूरा करने के लिए कानून में उत्तरोत्तर सुधार भी होना चाहिए।"

उन्होंने कहा, ‘‘आईबीसी का एक अन्य पहलू विधायिका द्वारा कानूनों को तैयार करने, संशोधित करने और अद्यतन करने में अपनाया गया दृष्टिकोण है। खामियों और कमियों को दूर करने के लिए किये गये संशोधन आश्चर्यजनक हैं।"

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