कटक,26 जुलाई राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने करगिल विजय दिवस के मौके पर करगिल युद्ध के नायकों को बुधवार को यहां श्रद्धांजलि अर्पित की।
मुर्मू अपने गृह राज्य के तीन दिवसीय दौरे पर हैं और उन्होंने 1999 के करगिल युद्ध के दौरान देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ ही ओडिशा के पद्मपाणि आचार्य की युद्ध के दौरान की शौर्य गाथा को याद किया। आचार्य को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
राष्ट्रपति ने उड़ीसा उच्च न्यायालय की स्थापना के 75 वर्ष होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में अपने समापन संबोधन में कहा कि इससे जुड़े लोगों को न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने की दिशा में काम करना चहिए तथा देश के समक्ष उदाहरण पेश करना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘आज करगिल विजय दिवस के मौके पर सभी देशवासी हमारे सशस्त्र बलों के अभूतपूर्व पराक्रम से मिली विजय को याद कर रहे हैं। देश की रक्षा के लिए अपने जीवन का बलिदान कर विजय का मार्ग प्रशस्त करने वाले सेनानियों को एक कृतज्ञ राष्ट्र की ओर से मैं श्रद्धांजलि देती हूं। उनकी शौर्य गाथाएं आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेंगी।’’
राष्ट्रपति ने सभी संबद्ध लोगों से मामूली आरोपों में जेल में बंद मासूम लोगों को आजाद कराने की दिशा में तेजी से काम करने का आह्वान किया।
उन्होंने मशहूर कहावत ‘‘विलंब से मिला न्याय,न्याय नहीं कहलाता’का जिक्र करते हुए कहा कि देर से न्याय मिलने के कारण बहुत से लोग जीवन के अहम वर्ष खो देते हैं। पीड़ित भी अपने जीवनकाल में दोषी को दंड पाते देखने की उम्मीद खो देते हैं।
राष्ट्रपति ने कहा, ‘‘ यह विषय मेरे दिल के काफी करीब है और मैं पहले भी कई मौकों पर इसका जिक्र कर चुकी हूं।’’
मुर्मू ने कहा कि संविधान लिखने वालों ने समाज के सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित वर्गों को न्याय दिलाने को प्राथमिकता दी। समाज के ऐसे वर्गों के लोगों के पास न्याय तक पहुंचने के लिए ना तो अधिक ज्ञान है और ना ही संसाधन, इसलिए उन्हें न्याय कैसे मिलेगा, इस सवाल पर ‘‘गहन मंथन’’ की जरूरत है।
एक साल पहले पदभार संभालने के बाद तीसरी बार अपने गृह राज्य की यात्रा पर आयीं मुर्मू ने करगिल युद्ध के नायकों को याद किया और उन सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की जिन्होंने 1999 में अपनी मातृभूमि के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया था।
उन्होंने कहा कि देश में कानूनी पेशा समय की कसौटी पर खरा उतरा है और इसने नागरिकों का विश्वास और सम्मान अर्जित किया है। उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के स्तंभों में से एक होने के लिए देश की न्यायपालिका को बधाई दी।
आजादी के बाद पिछले 75 वर्षों के दौरान उड़ीसा उच्च न्यायालय द्वारा किये गये परिवर्तनों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी संस्था जो समय के साथ नहीं बदलती है, वह पिछड़ जाती है।
उन्होंने कहा, ‘‘मुझे बताया गया है कि उड़ीसा उच्च न्यायालय ने न्यायिक प्रणाली में तकनीकी प्रगति को शामिल करने का प्रयास किया है।’’ इसके साथ ही उन्होंने कई आधुनिक और तकनीकी अधारित परिवर्तनों के माध्यम से गति में तेजी लाने की अदालत की पहल को सराहा। इस मौके पर राष्ट्रपति ने एक स्मारिका का विमोचन किया।
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