देश की खबरें | मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के लिये मानक तय करने की याचिका प्रतिवेदन के रूप में लें: उच्च न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को केन्द्र सरकार से कहा कि वह मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 के तहत मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के लिये न्यूनतम मानकों से संबंधित अधिसूचना जारी करने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका को प्रतिवेदन के रूप में स्वीकर करे।

एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 12 अक्टूबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को केन्द्र सरकार से कहा कि वह मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम 2017 के तहत मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के लिये न्यूनतम मानकों से संबंधित अधिसूचना जारी करने की मांग से जुड़ी जनहित याचिका को प्रतिवेदन के रूप में स्वीकर करे।

मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ ने निर्देश दिया कि प्रतिवेदन पर नियम, कायदे-कानूनों और सरकारी नीति पर लागू मामले के तथ्यों के आधार पर कोई फैसला लिया जाए।

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केन्द्र सरकार ने कहा है कि न्यूनतम मानकों का प्रारूप तैयार है और इसे अंतिम रूप दिये जाने के तुरंत बाद प्रकाशित कर दिया जाएगा या उसकी अधिसूचना जारी की जाएगी। इसके बाद अदालत की ओर से यह निर्देश आया है।

अदालत ने कहा कि इस मामले में जितनी जल्दी संभव हो सके उतनी जल्दी फैसला लेकर मानसिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता एवं वकील गौतम कुमार बंसल की याचिका का निपटान किया जाए।

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बंसल की याचिका में कहा गया है कि कानून पारित होने के 18 महीने के अंदर अधिसूचना जारी हो जानी चाहिये, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ है।

बंसल ने कहा कि यह कानून के कार्यान्वयन के संबंध में केन्द्र और दिल्ली सरकार के ''उदासीन रवैये'' को दर्शाता है।

याचिका में कहा गया है कि देश में की ऐसे मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठान हैं, जो दावा करते हैं कि वे आयुर्वेद, योग और नेचुरोपैथी जरिये मानसिक रोगियों का इलाज कर सकते हैं।

याचिका के अनुसार, ''इन प्रतिष्ठानों ने कभी केन्द्रीय मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण या राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरण में पंजीकृत नहीं कराया, जो मानसिक स्वास्थ्य कानून, 2017 के तहत अनिवार्य है।''

याचिका में दावा किया गया है, ''प्रतिवादी-2 (दिल्ली सरकार) ने अभी इन प्रतिष्ठानों के लिये न्यूनतम मानकों से संबंधित कोई अधिसूचना जारी नहीं की है और न ही यह स्पष्ट किया है कि ऐसे प्रतिष्ठानों को मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठान माना जाए या नहीं। ऐसे में मानसिक रोगी तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे ऐसे प्रतिष्ठानों में जाएं या नहीं।''

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