देश की खबरें | गोद लेने और संरक्षण के अधिकार संबंधी “विसंगतियों” को दूर करने के लिये न्यायालय में याचिका

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एनडीआरएफ/प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credits: ANI)

नयी दिल्ली, 30 जुलाई गोद लेने और संरक्षण प्राप्त करने के आधार से जुड़ी विसंगतियों को दूर करने और उन्हें सभी नागरिकों के लिये समान बनाने के उद्देश्य से उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है।

अधिवक्ता और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय द्वारा दायर याचिका में यह निर्देश देने की मांग की गई कि गोद लेने और संरक्षण से जुड़े “भेदभावपूर्ण आधार” संविधान के अनुच्छेद 14,15 और 21 का उल्लंघन करते हैं। याचिका में इसके साथ ही सभी नागरिकों के लिये गोद लेने और संरक्षण प्राप्त करने संबंधी “एक समान दिशानिर्देश” बनाने की भी मांग की गई है।

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भारतीय संविधान का अनुच्छेद कहता है कि कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं, अनुच्छेद 15 धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान के आधार पर भारतीयों में भेदभाव का निषेध करता है और अनुच्छेद 21 कहता है कि कानून द्वारा स्थापित प्रक्रियाओं को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से महरूम नहीं किया जा सकता।

अधिवक्ता अश्विनी कुमार दुबे के जरिये दायर की गई जनहित याचिका में दावा किया गया कि गोद लेने की मौजूदा प्रक्रिया में इसका व्यापक विरोधाभास है क्योंकि हिंदुओं में गोद लेने के लिये संहिताबद्ध कानून है लेकिन मुसलमानों, ईसाइयों और पारसियों में ऐसा नहीं है।

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याचिका में कहा गया, “हिंदू कानून के तहत गोद लिए बच्चे का पैतृक संपत्ति में अधिकार है लेकिन मुस्लिम, ईसाई और पारसी कानून में नहीं। हिंदू द्वारा गोद लिया गया बच्चा कानूनी वारिस बन सकता है जबकि ईसाइयों, मुसलमानों और पारसियों द्वारा गोद लिया गया नहीं।”

याचिका में विधि आयोग को यह निर्देश देने की मांग की गई है कि वह तीन महीने के अंदर “गोद लेने और संरक्षण संबंधी समान आधार” पर एक रिपोर्ट तैयार करे और ऐसा करने के दौरान वह कानून और अंतरराष्ट्रीय संधियों की श्रेष्ठ प्रक्रियाओं को ध्यान में रखे।

जनहित याचिका में कहा गया कि गोद लेना और संरक्षण प्राप्त करना इंसानी जीवन का एक बेहद महत्वपूर्ण और अहम पहलू है लेकिन आजादी के 73 सालों बाद भी भारत में लैंगिक समानता और धार्मिक समानता वाला कोई ऐसा कानून गोद और संरक्षण संबंधी नहीं है जो सभी नागरिकों के लिये एक समान हो।

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