देश की खबरें | एनएचआरसी के न्यायेत्तर हत्या मामले में आदेश लागू नहीं करवा पाने को लेकर याचिका दाखिल

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नयी दिल्ली, 12 फरवरी दिल्ली उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को एक याचिका पर मणिपुर सरकार और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) से जवाब मांगा जिसमें आरोप लगाया गया है कि आयोग न्यायेत्तर हत्या के दो मामलों में परिजनों को मुआवजा देने के लिए राज्य को दिए गए अपने निर्देश को लागू करवाने में ‘‘विफल’’ रहा है।

न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह ने मामले में मणिपुर राज्य को पक्षकार बनाया और उसे एवं मानवाधिकार आयोग को नोटिस जारी कर मानवाधिकार कार्यकर्ता सुहास चकमा की याचिका पर उनसे जवाब मांगा।

अदालत ने राज्य सरकार से पूछा कि मानवाधिकार आयोग के पांच मार्च 2020 के निर्देश को लागू करने के लिए उसने क्या कदम उठाए हैं जिसने मारे गए लोगों के परिजन को पांच लाख रुपये मुआवजा देने के लिए कहा था।

चकमा ने एनएचआरसी के आठ सितंबर 2020 के आदेश के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया। आदेश में कहा गया था कि अगर राज्य सरकार पांच मार्च 2020 के आदेश का पालन नहीं करती है तो मारे गए लोगों के परिजन मुआवजा राशि के लिए सक्षम अदालत में जा सकते हैं। सुहास गैर सरकारी संगठन --नेशनल कैंपेन फॉर प्रिवेंशन ऑफ टॉर्चर-- चलाते हैं जिसके गठन का उद्देश्य देश भर में होने वाले मानवाधिकार उल्लंघनों का समाधान है।

चकमा की तरफ से पेश हुए वकील नीतेश कुमार सिंह ने अदालत से कहा कि एनएचआरसी के पास अपने आदेशों को लागू करवाने के लिए पर्याप्त शक्तियां हैं और मुआवजा राशि प्राप्त करने का आदेश लागू करवाने के लिए उसे पीड़ितों के परिजन से सक्षम अदालत में जाने के लिए नहीं कहना चाहिए।

मानवाधिकार आयोग का आदेश जनवरी 2009 में चकमा की शिकायत पर आया था जिसमें उन्होंने आरोप लगाए थे कि दो व्यक्ति -- निंगथाउजाम आनंद सिंह और पालुंगबाम कुंजबिहारी उर्फ बोस को मणिपुर पुलिस के कमांडो ओर 16 असम राइफल्स के जवानों ने 21 जनवरी 2009 को इंफाल के कांगलाटोंबी माखन मार्ग पर मार दिया था।

मानवाधिकार आयोग ने पांच मार्च 2020 को मणिपुर सरकार के दावे को खारिज कर दिया था कि मुठभेड़ वास्तविक थी।

चकमा ने अपनी याचिका में आठ सितंबर 2020 के आदेश को दरकिनार करने और एनएचआरसी को निर्देश देने की मांग की कि अपने आदेश को लागू करने के लिए वह राज्य सरकार के खिलाफ कठोर कदम उठाए।

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