देश की खबरें | ‘पेटा’ ने जलीकट्टू, पशुओं से जुड़े अन्य खेलों पर फैसले की समीक्षा के लिये न्यायालय में दी याचिका

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नयी दिल्ली, 17 जुलाई ‘पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स’ (पेटा) ने तमिलनाडु, महाराष्ट्र और कर्नाटक के संशोधित कानूनों की वैधता को बरकरार रखने वाले उच्चतम न्यायालय के 18 मई के एक फैसले की समीक्षा के लिए शीर्ष अदालत का रुख किया है।

न्यायालय ने अपने फैसले में सांडों को वश में करने वाले खेल जलीकट्टू, बैलगाड़ी दौड़ और भैंस दौड़ ‘कंबाला’ को अनुमति दी थी।

अपनी पुनर्विचार याचिका में पेटा ने कहा है कि फैसले के रिकॉर्ड में स्पष्ट त्रुटियां हैं और शीर्ष अदालत द्वारा पुनर्विचार क्षेत्राधिकार के प्रयोग की आवश्यकता है।

एक सर्वसम्मत फैसले में, न्यायमूर्ति के.एम. जोसेफ (अब सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने पाया कि जानवरों के प्रति क्रूरता की रोकथाम (तमिलनाडु संशोधन) अधिनियम, 2017, जानवरों के प्रति क्रूरता की रोकथाम (महाराष्ट्र संशोधन) अधिनियम, 2017 और जानवरों के प्रति क्रूरता निवारण (कर्नाटक दूसरा संशोधन) अधिनियम, 2017 को संबंधित राज्य विधानसभाओं द्वारा अधिनियमित किया गया था और उन्हें राष्ट्रपति की सहमति प्राप्त थी।

‘जलीकट्टू’, जिसे ‘एरुथाझुवुथल’ भी कहा जाता है, तमिलनाडु में पोंगल फसल उत्सव के हिस्से के रूप में खेला जाने वाला एक खेल है।

नवंबर और मार्च के बीच कर्नाटक में आयोजित ‘कंबाला’ दौड़ में भैंसों की एक जोड़ी को हल से बांधा जाता है और एक व्यक्ति द्वारा उसे पकड़ा जाता है। उन्हें एक प्रतियोगिता में समानांतर पानी भरे मार्ग पर दौड़ाया जाता है जिसमें सबसे आगे रहने वाली टीम जीतती है।

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि जलीकट्टू एक प्रकार का गोवंशीय खेल है और ‘‘हमारे सामने आई सामग्री के आधार पर हम संतुष्ट हैं कि यह तमिलनाडु राज्य में कम से कम पिछली कुछ शताब्दियों से चल रहा है।’’

फैसले की समीक्षा की मांग करते हुए ‘पेटा’ ने अपनी याचिका में कहा है कि ये ‘खेल’ बैलों और भैंसों की प्राकृतिक प्रवृत्ति, व्यवहार और शारीरिक रचना के खिलाफ हैं, और ‘‘उनमें इस्तेमाल किए गए जानवरों के लिए अनकही पीड़ा, दर्द और क्रूरता का कारण बनते हैं।’’

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