ताजा खबरें | विपक्ष ने सरकार पर लगाया आदिवासियों को उनके आर्थिक हक से वंचित रखने का आरोप
Get latest articles and stories on Latest News at LatestLY. बजट में दलितों और आदिवासियों को उनके आर्थिक हक से वंचित रखने का आरोप लगाते हुए विपक्ष ने मंगलवार को राज्यसभा में दावा किया कि सरकार की कथनी और करनी में अंतर है। वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष ने दावा किया कि भ्रष्टाचार पर लगाम कसने से आदिवासियों के कल्याण के लिए चलाई जा रही योजनाओं का समुचित कार्यान्वयन हो रहा है और यह वर्ग लाभान्वित हो रहा है।
नयी दिल्ली, 15 मार्च बजट में दलितों और आदिवासियों को उनके आर्थिक हक से वंचित रखने का आरोप लगाते हुए विपक्ष ने मंगलवार को राज्यसभा में दावा किया कि सरकार की कथनी और करनी में अंतर है। वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष ने दावा किया कि भ्रष्टाचार पर लगाम कसने से आदिवासियों के कल्याण के लिए चलाई जा रही योजनाओं का समुचित कार्यान्वयन हो रहा है और यह वर्ग लाभान्वित हो रहा है।
कांग्रेस सदस्य नारणभाई जेठवा ने राज्यसभा में जनजातीय मंत्रालय के कामकाज पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि 2022-23 का बजट पूरी तरह से कारपोरेट क्षेत्र का बजट है जिसमें दलित और आदिवासी कहीं नजर नहीं आते। उन्होंने कहा कि नीति आयोग के निर्देशों का भी उल्लंघन किया गया है और दलित और आदिवासी समुदाय के लिए उनकी आबादी के अनुरूप आवंटन नहीं किया गया। उन्होंने कहा ‘‘पिछले सात आठ साल ये यह सिलसिला चल रहा है।’’
उन्होंने कहा कि कोविड महामारी की वजह से पहले से ही परेशान दलितों और आदिवासियों को राहत देने के लिए किसी भी नयी योजना का प्रस्ताव नहीं किया गया है।
उन्होंने कहा ‘‘सरकार के पूरे बजट का मात्र करीब 3.61 फीसदी ही अनुसूचित जाति जनजाति समुदाय के लिए है जबकि उनकी आबादी करीब 16.2 फीसदी है।’’
जेठवा ने कहा ‘‘जनजातीय मंत्रालय के लिए आवंटन बढ़ाया गया है लेकिन यह वृद्धि समुचित नहीं है। यह दुख की बात है कि अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए श्रम कल्याण योजना का आवंटन घटा दिया गया। उनकी अन्य योजनाओं के आवंटन में भी कमी की गई है जबकि आवंटन बढ़ाया जाना चाहिए था।’’
उन्होंने कहा कि मनरेगा पर अनुसूचित जाति, जनजाति समुदाय की निर्भरता अत्यधिक है लेकिन उसके लिए किया गया आवंटन इतना नहीं है कि उसे पर्याप्त माना जा सके।
उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार की प्राथमिकता दलित और आदिवासी नहीं हैं और इस साल के बजट से यह बात साफ हो जाती है। उन्होंने कहा कि कई गांवों में अवसंरचना का अभाव है। उन्होंने कहा ‘‘39953 गांवों में आज भी सड़क संपर्क नहीं हैं, 34990 गांव में परिवहन की सुविधा नहीं है, 87500 गांवों में इंटरनेट की सुविधा नहीं है, 61656 गांवों में पेयजल की सुविधा नहीं है, 17638 गांवों में लैंडलाइन और मोबाइल फोन की सुविधा नहीं है।’’
उन्होंने कहा ‘‘ 13501 गांव ऐसे हैं जहां एक भी स्कूल नहीं है, 58,600 गांवों में नालियां नहीं हैं, 7000 से अधिक गांवों में बिजली नहीं है, 39786 गांवों में 10 किमी के दायरे में बैंक की सुविधा नहीं है 90100 गांवों में बाजार की सुविधा नहीं है। एक करोड़ बीस लाख से अधिक आदिवासी घरों में एलपीजी और बायोगैस की सुविधा नहीं है। 28131 गांवों में दस किमी के दायरे में स्वास्थ्य संबंधी कोई सुविधा नहीं है।’’
राठवा ने दावा किया कि जनजाति बहुल इलाकों में बनाए गए एकलव्य विद्यालयों और नवोदय विद्यालयों में पढ़ाने के लिए उच्च शिक्षित शिक्षक नहीं हैं। उन्होंने कहा ‘‘इसी तरह गांवों में अस्पताल नहीं हैं, अगर अस्पताल हैं तो वहां डॉक्टर नर्स और अन्य सुविधाएं नहीं हैं। फिर सरकार कौन से विकास का दावा करती है ? ’’
उन्होंने कहा ‘‘कोविड महामारी के दौरान बच्चों को ऑनलाइन शिक्षा दी गई। आदिवासियों के पास एंड्रॉयड फोन नहीं बल्कि सादे फोन होते हैं। ऐसे में आदिवासी बच्चों की पढ़ाई कैसे हुई होगी ? गांवों में कितने बीएसएनएल के टॉवर हैं? आदिवासी बच्चों की पढ़ाई के लिए यह बहुत जरूरी है।’’
जारी
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(The above story first appeared on LatestLY on Mar 15, 2022 05:37 PM IST. For more news and updates on politics, world, sports, entertainment and lifestyle, log on to our website latestly.com).

