देश की खबरें | हिंदी की सबसे महंगी व सफल फिल्मों में से एक मुगल ए आजम के 60 साल पूरे
Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. विद्रोही शहजादा सलीम और अनारकली के प्रेम पर आधारित काव्यात्मक क्लासिकल फिल्म "मुग़ल ए आज़म" के प्रदर्शन के 60 साल पूरे हो गए। यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित, महंगी और सफल फिल्मों में से एक है जिसके प्रति लोगों का आकर्षण अब भी बरकरार है।
मुंबई, 10 अगस्त विद्रोही शहजादा सलीम और अनारकली के प्रेम पर आधारित काव्यात्मक क्लासिकल फिल्म "मुग़ल ए आज़म" के प्रदर्शन के 60 साल पूरे हो गए। यह फिल्म हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित, महंगी और सफल फिल्मों में से एक है जिसके प्रति लोगों का आकर्षण अब भी बरकरार है।
फिल्म इतिहासकार एसएमएम औसजा के अनुसार एक सवाल के जवाब पर फिल्मकार के आसिफ ने कहा था कि अगर वह सलीम की भूमिका निभाने वाले अभिनेता दिलीप कुमार को साधारण जूते देंगे तो अभिनेता दिलीप कुमार की तरह चलेंगे। लेकिन अगर उन्हें महंगे जूते दिए गए जो वह सलीम की तरह चलेंगे।
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आसिफ से सवाल किया गया था कि वह फिल्म में जूतों पर भारी राशि क्यों खर्च कर रहे हैं। इस फिल्म के सेट, कपड़े सभी बेमिसाल हैं।
आसिफ की उम्र उस समय तीस साल भी नहीं हुयी थी और उन्होंने एक ऐसी फिल्म बनायी जिसे भव्य फिल्मों का पर्याय कहा जाता है।
"मुग़ल-ए-आज़म" फिल्म में पृथ्वीराज कपूर ने बादशाह अकबर की भूमिका निभायी थी जबकि दुर्गा खोटे ने जोधा बाई की, दिलीप कुमार ने सलीम की और मधुबाला ने अनारकली की भूमिका की।
यह फिल्म पांच अगस्त 1960 को पहली बार परदे पर आयी। नौशाद के संगीत ने भी संगीतप्रेमियों को मोहने में कोई कसर नहीं छोड़ी। "मोहे पनघट पे नंद लाल" और "प्यार किया तो डरना क्या" जैसे गानों को आज भी खूब पसंद किया जाता है। दर्शकों को यह फिल्म इतनी भायी कि वे इसे देखने बार बार सिनेमाघरों में जाने लगे।
कुछ कहानियां व और उद्धरण लोककथाओं का हिस्सा बन गए। वास्तव में, "मुग़ल ए आज़म" का निर्माण कैसे हुआ, इसपर भी एक फिल्म बन सकती है।
सुर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने कहा कि इस फिल्म में कहानी को आगे बढ़ाने में संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
उन्होंने पीटीआई से कहा, ‘‘मैं के आसिफ साहब से शायद दो-तीन बार मिली थी। हमारी ज्यादातर बातचीत नौशाद साहब के साथ होती थी। वह पहले निर्देशक से बातचीत करते थे, चीजों को समझते थे और फिर बेहतरीन संगीत की जिम्मेदारी लेते थे। आसिफ साहब गीतों से हमेशा खुश होते थे। शकील बदायुनी साहब ने इतनी सुंदर पंक्तियां लिखी हैं। हर गीत इतना मधुर है।’’
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