नयी दिल्ली, 15 सितंबर दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि केवल दिव्यांग होने की वजह से किसी व्यक्ति को किसी भी व्यवसाय से जुड़ने या व्यापार करने के उसके संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने कहा कि किसी दिव्यांग व्यक्ति को कोई भी व्यापार या व्यवसाय करने के अधिकार से वंचित करना ‘‘पूरी तरह से प्रतिगामी’’ होगा और उसके संवैधानिक अधिकार का अनादर होगा।
अदालत की ये टिप्पणियां दिल्ली के अजमेरी गेट क्षेत्र में किराये की दुकान चलाने वाले कुछ लोगों की याचिका पर आई है। उन्होंने किराये की दुकान खाली करने के एक निचली अदालत के आदेश को चुनौती दी थी। उन्हें इस आधार पर दुकान खाली करने को कहा गया कि दुकान स्वामी को अपने बेटे को कोई व्यापार शुरू कराने के लिए दुकान चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने विभिन्न आधार पर आदेश का विरोध किया। इसमें एक तर्क दिया गया कि दुकान मालिक के बेटे की आंख की रोशनी कमजोर है और उसे इलाज से भी ठीक नहीं किया जा सकता। उनका तर्क था कि इसलिए वह स्वतंत्र रूप से कोई व्यापार करने की स्थिति में नहीं है।
अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि दुकान खाली करने के आदेश में किसी तरह के हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं है और यह रुख संवैधानिक सिद्धांतों और दिव्यांग जन अधिकार अधिनियम के उद्देश्यों एवं प्रावधानों के विरोधाभासी है।
अदालत ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया कि आंख की रोशनी कम होने की वजह से दुकान मालिक का बेटा कोई व्यवसाय करने में सक्षम नहीं है।
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