अब देर से बिलों से निकलती हैं गिलहरियां

जलवायु परिवर्तन का असर अलास्का में रहने वाली गिलहरियों के जीवन चक्र को बदल रहा है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

जलवायु परिवर्तन का असर अलास्का में रहने वाली गिलहरियों के जीवन चक्र को बदल रहा है. नर और मादा गिलहरियों के शारीरिक संबंध बनाने में भी बदलाव हो रहे हैं.अलास्का आने वाली सर्दी की तैयारी कर रहा है. आर्कटिक क्षेत्र का यह बर्फीला इलाका जमीन के नीचे रहने वाली गिलहिरयों का घर है, जो सर्दियों में आठ महीने लंबी शीतनिद्रा में चली जाती हैं. उसके बाद वे बसंत के महीने में बाहर आती हैं और तब वे ना सिर्फ भूखी होती हैं बल्कि बच्चे पैदा करने को भी बहुत उत्सुक होती हैं.

इन जीवों का अध्ययन कर रहे वैज्ञानिकों ने पाया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण गिलहरियों के व्यवहार में बहुत बड़े बदलाव आ रहे हैं. जैसे-जैसे तापमान बढ़ रहा है, गिलहरियों के शीतनिद्रा से बाहर निकलने का वक्त भी कम होता जा रहा है. पिछली सदी की तुलना में इसमें दस दिन का फर्क पड़ चुका है. यानी अब वे समय से दस दिन पहले ही बिलों से निकल आती हैं.

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दूसरी तरफ नर गिलहरियां अब ज्यादा समय तक बिलों में रहती हैं. गुरुवार को साइंस पत्रिका में छपे अध्ययन में बताया गया है कि इस परिवर्तन का असर प्रजनन पर पड़ सकता है.

शोधकर्ता बताते हैं कि पहले नर गिलहरियां मादाओं से करीब एक महीना पहले शीतनिद्रा से बाहर आ जाती थीं. शीतनिद्रा में उनके अंडकोष सिकुड़ जाते हैं. मादाओं से एक महीने पहले बाहर आने पर उनके अंडकोष सामान्य स्थिति में लौट आते थे. लेकिन अब दोनों के बाहर निकलने के समय में अंतर कम हो गया है.

कैसे हुआ अध्ययन?

मुख्य शोधकर्ता कॉलराडो स्टेट यूनिवर्सिटी में जीवविज्ञानी कोरी विलियम्स बताते हैं, "अगर यह जारी रहा तो होगा ये कि मादाएं प्रजनन के लिए तैयार होकर बिलों से निकलेंगी लेकिन तब तक नर पूरी तरह तैयार नहीं होंगे.”

आर्कटिक क्षेत्र के बहुत से प्राणियों की तरह भूमिगत गिलहरियों ने भी अत्यधिक सर्दी के मुताबिक खुद को ढाल लिया है. वे साल में करीब आठ महीने तक शीतनिद्रा में रहती हैं. इसके लिए वे टुंड्रा प्रदेश में परमाफ्रोस्ट के ठीक ऊपर नदियों के किनारे रेतीली जमीन में करीब तीन फुट गहरे बिल बनाती हैं.

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इस दौरान अधिकतर स्तनधारियों के शरीर का तापमान लगभग 37 डिग्री कम होकर शून्य से तीन डिग्री नीचे चला जाता है. इसका असर उनके मस्तिष्क, फेफड़ों, हृदय और अन्य अंगों की सक्रियता पर पड़ता है और वे धीमे हो जाते हैं.

ताजा अध्ययन में शामिल विशेषज्ञों ने दो जगहों से मिट्टी और हवा का लंबे समय तक अध्ययन किया और आंकड़े जमा किये. इन आंकड़ों को जीवविज्ञानियों द्वारा जुटाये गये आंकड़ों से मिलाया गया. जीवविज्ञानियों ने इसी अवधि में 199 भूमिगत गिलहरियों के पेट और त्वचा के तापमान के आंकड़े जमा किये थे.

शोधकर्ताओं ने पाया कि वातावरण का तापमान काफी ज्यादा बढ़ गया था, जिसे जलवायु परिवर्तन का प्रभाव माना जा रहा है. वैश्विक औसत के मुकाबले यहां के तापमान में चार गुना की वृद्धि पायी गयी.

दोहरा असर

विलियम्स कहते हैं, "सर्दियों में मिट्टी का न्यूनतम तापमान अब ज्यादा है. यह ठंडी नहीं हो रही है. और फिर हमने देखा कि मिट्टी के जमने का चक्र भी बदल गया है. यानी अब मिट्टी ज्यादा देर से जम रही है और जल्दी नरम हो जा रही है.”

विशेषज्ञ कहते हैं कि इस बदलाव का प्राणियों पर दो तरह से असर पड़ेगा. वे शीतनिद्रा में जा तो एक साथ रहे हैं लेकिन उनके शरीर के तापमान में गिरावट का समय अलग-अलग है. इस कारण उस समय में फर्क आ गया है, जिसमें उनका शरीर उत्तकों को मरने से बचाने के लिए गर्मी पैदा करता है.

दूसरा प्रभाव यह हुआ है कि मादाएं पहले से जल्दी शीतनिद्रा से बाहर निकल रही हैं क्योंकि मिट्टी जल्दी नरम हो रही है. हालांकि इसके कारण उनके शरीर पर क्या असर हो रहे हैं, इसके बारे में अभी जानकारी नहीं है लेकिन वैज्ञानिकों ने कुछ अनुमान लगाये हैं.

नर गिलहरियां शीतनिद्रा तब खत्म करती हैं जब उनके शरीर में टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन का स्तर बढ़ने लगता है. लेकिन मादाएं पर्यावरण में हो रहे बदलावों के अनुरूप जल्दी ढाल रही हैं.

विलियम्स बताते हैं, "हमने पाया कि कई बार मादाएं शीतनिद्रा से जल्दी बाहर आ रही हैं और तब वे बाहर आकर हालात का जायजा लेती हैं और अगर जरूरत महसूस करती हैं तो वापस चली जाती हैं.”

वीके/सीके (एएफपी)

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