देश की खबरें | हाई प्रोफाइल मामला संभालने वाले हर पुलिस अधिकारी को सुरक्षा देना संभव नहीं : उच्च न्यायालय

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि हत्या के मामले की जांच करने वाले या हाई प्रोफाइल मामलों को संभालने वाले हर सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी को चौबीसों घंटे सुरक्षा मुहैया करना संभव नहीं होगा।

नयी दिल्ली, 12 अगस्त दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि हत्या के मामले की जांच करने वाले या हाई प्रोफाइल मामलों को संभालने वाले हर सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी को चौबीसों घंटे सुरक्षा मुहैया करना संभव नहीं होगा।

इसी के साथ अदालत ने उत्तर प्रदेश के एक सेवानिवृत्त वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की सुरक्षा की मांग वाली याचिका खारिज कर दी, जिन्होंने नीतीश कटारा हत्याकांड की जांच की थी।

30 नंवबर 2021 को सेवानिवृत्त होने वाले पूर्व पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) अनिल समानिया ने दलील दी थी कि उन्हें 2002 से सुरक्षा प्रदान की गई थी और सेवानिवृत्ति के बाद उनकी सुरक्षा वापस ली जानी थी, लेकिन ऐसी स्थिति में उनके और उनके परिवार के सदस्यों के जीवन को गंभीर खतरा होगा।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने समानिया को सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई थी।

अपनी सेवानिवृत्ति से पहले याचिका दायर करने वाले समानिया ने कहा था कि वह उत्तर प्रदेश पुलिस में 40 साल की अनुकरणीय सेवा देने के बाद सेवानिवृत्त हो रहे हैं और उन्होंने नीतीश कटारा हत्याकांड की जांच की थी, जिसमें पूर्व मंत्री डीपी यादव के बेटे और भतीजे क्रमश: विकास और विशाल यादव शामिल थे।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने उत्तर प्रदेश सरकार के इस तर्क को संज्ञान में लिया कि उसने याचिकाकर्ता के समक्ष मौजूद खतरों का विश्लेषण किया है और पाया है कि ‘याचिकाकर्ता के समक्ष अभी तक कोई खतरा नहीं मिला है।’

अदालत ने इस तर्क पर भी गौर फरमाया कि याचिकाकर्ता एक प्रशिक्षित पुलिस अधिकारी था, जिस पर अपने अधिकार क्षेत्र के नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा का जिम्मा था।

न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार याचिकाकर्ता के समक्ष मौजूद खतरों का सबसे सटीक आकलन कर सकती है।

पिछले महीने पारित आदेश में उन्होंने कहा, “अगर उन्होंने जांच की है और इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि याचिकाकर्ता के समक्ष अभी तक कोई खतरा उत्पन्न होता नहीं मिला है तो यह अदालत राज्य सरकार के निर्णय पर अपने फैसले को प्रतिस्थापित नहीं कर सकती है। एक बार राज्य सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंच जाती है कि याचिकाकर्ता को चौबीसों घंटे सुरक्षा मुहैया कराने की जरूरत नहीं है तो मेरे विचार से यह मामला वहीं पर खत्म हो जाना चाहिए।”

उच्च न्यायालय ने कहा कि अगर अपने सेवा काल में हत्या के मामले में जांच अधिकारी की भूमिका निभाने वाले या हाई-प्रोफाइल मामले संभालने वाले हर पुलिस अधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद चौबीसों घंटे सुरक्षा मुहैया करानी पड़े तो यह न तो संभव होगा और न ही वांछनीय।

उच्च न्यायालय ने कहा कि अदालत सभी नागरिकों और उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिनमें संवेदनशील मामले संभालने वाले अधिकारी भी शामिल हैं।

उसने कहा, “हालांकि, जब कोई खतरा देखा या महसूस ही नहीं किया जाता है तो सुरक्षा मुहैया कराना राज्य के संसाधनों, समय, मशीनरी और पुलिस बल के काबिल अधिकारियों की सेवा की बर्बादी होगा। बड़ी संख्या में ऐसे मामले और अपराध हैं, जिनकी जांच की जानी है या फिर जिनकी तफ्तीश चल रही है या फिर इस अदालत द्वारा उनका निपटारा किया जाना है, जिसके लिए सरकारी मशीनरी की जरूरत है।”

न्यायमूर्ति सिंह ने कहा, “मुझे इस तथ्य का संज्ञान लेना चाहिए कि न केवल अदालतें मामलों के बोझ तले दबी हुई हैं, बल्कि पुलिस अधिकारियों पर भी काम का काफी दबाव है। ऐसे में याचिकाकर्ता के जीवन को खतरे के संबंध में कोई सबूत न होने की सूरत में उसकी सुरक्षा में बल के कुछ जवान लगाना अनुचित होगा।”

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