देश की खबरें | कोविड रोधी टीके की अनिवार्यता से कोई कुछ नहीं खो रहा: केंद्र ने न्यायालय से कहा

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. केंद्र ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय में इस दलील का विरोध किया कि विभिन्न राज्यों और अधिकारियों द्वारा जारी कोविड रोधी टीके की अनिवार्यता के आदेश के कारण लोगों को अपनी नौकरी और राशन गंवाना पड़ रहा है।

नयी दिल्ली, 31 जनवरी केंद्र ने सोमवार को उच्चतम न्यायालय में इस दलील का विरोध किया कि विभिन्न राज्यों और अधिकारियों द्वारा जारी कोविड रोधी टीके की अनिवार्यता के आदेश के कारण लोगों को अपनी नौकरी और राशन गंवाना पड़ रहा है।

न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ के समक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह तर्क दिया। पीठ उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें कोविड रोधी टीकों के नैदानिक ​​​​परीक्षणों के डेटा के खुलासे और टीका अनिवार्यता जैसे मुद्दों को उठाया गया है।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि कई राज्यों और अन्य अधिकारियों द्वारा जारी किए जा रहे टीका अनिवार्यता आदेश का पहलू अत्यावश्यक है क्योंकि लोग अपनी नौकरी खो रहे हैं।

भूषण ने कहा, “अभी, क्या टीका अनिवार्यता जरूरी है क्योंकि लोग अपनी नौकरी खो रहे हैं। उन्हें अपना राशन गंवाना पड़ रहा रहा है। इन टीकों की अनिवार्यता के परिणामस्वरूप वे स्वतंत्र रूप से घूमने में सक्षम नहीं हैं।”

मेहता ने पीठ को बताया कि याचिकाकर्ता ने इस मामले में एक अर्जी दाखिल कर दावा किया है कि इससे लोगों की नौकरी जा रही है।

उन्होंने कहा, "श्री भूषण ने एक आवेदन में दावा किया है कि बहुत से लोग अपनी नौकरी खो रहे हैं इत्यादि। कोई भी कुछ नहीं खो रहा है और कोई भी आपके सामने नहीं आया है।"

सुनवाई के दौरान, पीठ ने भूषण से कहा कि ये सभी मामले, जो याचिकाकर्ता संज्ञान में ला रहे हैं, अदालत के लिए तय करना संभव नहीं हो सकता क्योंकि कई स्थितियां हो सकती हैं।

पीठ ने कहा कि वह इस मामले की अंतिम रूप से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करेगी और फिर इस पर फैसला करेगी।

भूषण ने कहा, "आज स्थिति यह है कि लोग अपनी नौकरी खो रहे हैं।"

पीठ ने कहा कि कई स्थितियां हो सकती हैं और संबंधित उच्च न्यायालय विशिष्ट मुद्दों से निपट सकते हैं।

शीर्ष अदालत ने पिछले साल अगस्त में केंद्र, भारत बायोटेक, सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया और अन्य को उस याचिका पर जवाब देने को कहा था, जिसमें कोविड रोधी टीकों के नैदानिक ​​परीक्षणों के साथ-साथ जांच के बाद के डेटा का खुलासा करने का निर्देश देने का आग्रह किया गया था।

भूषण ने तब अदालत से कहा था कि यह "टीका विरोधी याचिका" नहीं है और इस मुद्दे पर पारदर्शिता की आवश्यकता है क्योंकि डेटा के खुलासे से सभी झिझक और संदेह दूर हो जाएंगे।

यह स्पष्ट करते हुए कि याचिकाकर्ता जारी टीकाकरण को रोकने का आग्रह नहीं कर रहा, उन्होंने कहा था कि याचिका में टीका अनिवार्य करने का आदेश जारी किए जाने का मुद्दा उठाया गया है, जैसे कि अगर किसी को टीका नहीं लगाया गया है तो उसकी यात्रा पर कुछ प्रतिबंध लगाना।

भूषण ने पहले कहा था कि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के सीरो-सर्वेक्षण के अनुसार, देश की लगभग दो-तिहाई आबादी को पहले ही कोविड हो चुका है और इसमें कोई संदेह नहीं है कि इससे प्राप्त प्रतिरक्षा इन टीकों से प्राप्त होने वाली तुलना में बहुत अधिक स्थायी और बेहतर है।

शीर्ष अदालत डॉ. जैकब पुलियेल की याचिका पर सुनवाई कर रही है, जो टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह के पूर्व सदस्य हैं और उन्होंने प्रतिकूल प्रभाव के संबंध में टीकाकरण के बाद के आंकड़ों का खुलासा करने के निर्देश दिए जाने का भी आग्रह किया है।

याचिका में शीर्ष अदालत से यह घोषणा करने का भी आग्रह किया गया है कि कि किसी भी लाभ या सेवाओं तक पहुंचने के लिए टीके को पूर्व शर्त बनाना नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन है और असंवैधानिक है।

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