नयी दिल्ली, 17 सितंबर उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वर्तमान और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के निस्तारण में कोई ठोस प्रगति नहीं हुयी है। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को इन मामलों की सुनवाई करने के लिये विशेष अदालतों को तर्कसंगत बनाने के बारे मे कार्य योजना पेश करने का निर्देश दिया है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इन विधि निर्माताओं में उनके मतदाताओं ने भरोसा और विश्वास जताया है और ऐसी स्थिति में उनकी पृष्ठभूमि के बारे में जागरूकता पैदा करना जरूरी है। न्यायालय लगातार सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के तेजी से निबटारे पर जोर दे रहा है।
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न्यायमूर्ति एन वी रमण, न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय की पीठ ने इस मामले में बुधवार को अपने आदेश में कहा,‘‘लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित संस्थानों की पवित्रता बनाये रखना ही वर्तमान कार्यवाही की कसौटी है।’’
न्यायालय की वेबसाइट पर बृहस्पतिवार को अपलोड किये गये इस आदेश में पीठ ने कहा, ‘‘पेश याचिका पर न्यायालय की तमाम पहल के बावजूद, वर्तमान और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के निस्तारण की स्थिति में कोई ठोस सुधार नहीं हुआ है।’’
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शीर्ष अदालत ने यह आदेश भाजपा नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा 2016 में दायर जनहित याचिका पर दिया। इस याचिका में विधि निर्माताओं के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों के निस्तारण में अत्यधिक विलंब का मुद्दा उठाया गया है।
पीठ ने कहा कि इस याचिका पर नोटिस जारी करने और विभिन्न आदेश देने का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों का तेजी से निस्तारण हो।
पीठ ने कहा, ‘‘न्यायालय की राय है कि देश की राजनीति के अपराधीकरण की तेज हो रही बयार की वजह से ही नहीं बल्कि मुकदमे को प्रभावित करने या बाधित करने की निर्वाचित प्रतिनिधियों की ताकत की वजह से भी इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता थी।’’
पीठ ने सभी उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से कहा है कि वर्तमान और पूर्व विधि निर्माताओं की संलिप्तता वाले उन सभी लंबित आपराधिक मामलों को उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाये जिनमें रोक लगाई गयी थी।
पीठ ने कहा कि अगर रोक लगाना जरूरी समझा जाता है तो न्यायालय को ऐेसे मामले की अनावश्यक स्थगन के बगैर ही दैनिक आधार पर सुनवाई करके दो महीने के भीतर उसका निस्तारण करना चाहिए।
पीठ ने न्याय मित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया और अधिवक्ता स्नेहा कलिता द्वारा पेश पूरक रिपोर्ट का जिक्र्र करते हुये कहा कि इससे पता चलता है कि पूर्व और वर्तमान सांसदों-विधायकों के खिलाफ करीब 175 मामले भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत लंबित हैं जबक 14 मामले धन शोधन रोकथाम कानून के तहत लंबित हैं।
पीठ ने कहा कि इसके अलावा आठ सितंबर 2020 को पेश पहली रिपोर्ट के अनुसार विधि निर्माताओं के खिलाफ 4,442 मामले लंबित हैं।
पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों को कार्य योजना तैयार करते समय उन मुकदमों को स्थानांतरित करने पर भी विचार करना चाहिए जिनमें सुनवाई तेजी से हो रही है।
न्यायालय ने कहा कि मुख्य न्यायाधीशों को अपने सुझावों और टिप्पणियों के साथ यह कार्य योजना एक सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल के पास भेजनीचाहिए।
पीठ ने इस मामले को दो सप्ताह बाद सूचीबद्ध करते हुये कहा कि न्याय मित्र के अन्य सुझावों पर उचित समय पर निर्देश दिये जायेंगे।
अनूप
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