मुंबई, 15 जुलाई बंबई उच्च न्यायालय ने एक विज्ञान संस्थान में नामांकन के लिए निर्धारित समय सीमा के भीतर फॉर्म जमा करने में विफल रहे एक छात्र को कोई राहत देने से इनकार करते हुए कहा कि उसे महज इसलिए दाखिला प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि उसने अच्छी रैंक हासिल की है।
न्यायमूर्ति ए.एस. चंदुरकर और न्यायमूर्ति राजेश पाटिल की खंडपीठ ने 10 जुलाई को अपने आदेश में यह भी कहा कि केवल सहानुभूति के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती। पीठ ने कहा कि ऐसी कोई भी राहत अन्य छात्रों के साथ अन्याय होगी।
अदालत सिद्धांत राणे द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें भारतीय विज्ञान संस्थान(आईआईएस), बेंगलुरु को चार वर्षीय विज्ञान स्नातक (अनुसंधान) कार्यक्रम के लिए उसका आवेदन स्वीकार करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
राणे को प्रवेश प्रक्रिया के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया क्योंकि उसने अपना ऑनलाइन आवेदन पत्र अंतिम तिथि के बाद जमा किया था।
संस्थान के अनुसार, फॉर्म एक अप्रैल से सात मई 2024 तक ऑनलाइन जमा किए जाने थे और फिर तारीख 14 मई तक बढ़ा दी गई थी। राणे ने फॉर्म नौ जून को जमा किया।
अपनी याचिका में राणे ने कहा कि ‘आईआईएसईआर एप्टीट्यूड टेस्ट’ (आईएटी) में उसकी अखिल भारतीय रैंक 10वीं थी और इसलिए वह निर्धारित कट ऑफ अंकों के अनुसार प्रवेश पाने का पात्र है।
उसने कहा कि उसकी रैंकिंग के आधार पर उसे प्रवेश प्रक्रिया में भाग लेने तथा आवश्यक दस्तावेज अपलोड करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
संस्थान ने याचिका का विरोध किया और कहा कि आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि तक उसे लगभग 11,180 फॉर्म प्राप्त हुए थे।
पीठ ने कहा कि राणे ने अपना आवेदन पत्र नौ जून को जमा किया था, जो निर्धारित समय सीमा से काफी बाद की तारीख है।
अदालत ने कहा, “केवल सहानुभूति के आधार पर” छात्र को राहत नहीं दी जा सकती।
याचिका खारिज करते हुए उच्च न्यायालय ने कहा, “ऐसी राहत देने से अन्य आवेदकों के साथ अन्याय होगा।”
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