कार्बन डाई ऑक्साइड से भी खतरनाक है नाइट्रस ऑक्साइड

बेहद खतरनाक ग्रीनहाउस गैस नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर तय किए गए लक्ष्यों को खतरे में डाल सकता है.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

बेहद खतरनाक ग्रीनहाउस गैस नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि जलवायु परिवर्तन को लेकर तय किए गए लक्ष्यों को खतरे में डाल सकता है.एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया है कि दुनियाभर में नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है. बुधवार को प्रकाशित हुए इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने कहा है कि जिस स्तर पर नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन बढ़ा है, उससे ग्लोबल वॉर्मिंग कम करने के लिए तय किए गए लक्ष्य भी खतरे में हैं.

वैज्ञानिकों ने दुनियाभर में पर्यावरण के करोड़ों आंकड़ों के विश्लेषण के बाद यह शोध पत्र लिखा है. इन आंकड़ों में नाइट्रस ऑक्साइड के उत्सर्जन में स्पष्ट और भारी वृद्धि दर्ज की गई. विशेषज्ञ कहते हैं कि मुख्य तौर पर खेती-किसानी की गतिविधियों से पैदा होने वाली इस गैस का उत्सर्जन रोकने के लिए बहुत कम कोशिशें की जा रही हैं.

नाइट्रस ऑक्साइड पृथ्वी के वातावरण को कार्बन डाई ऑक्साइड से 300 गुना ज्यादा गर्म करती है और एक बार वातावरण में पहुंचने पर यह एक सदी से भी ज्यादा समय तक मौजूद रह सकती है.

चार दशक में 40 फीसदी

58 अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के अध्ययन पर आधारित रिपोर्ट ‘ग्लोबल नाइट्रस ऑक्साइड बजट' में कहा गया है कि 2020 तक के चार दशकों में इस गैस का उत्सर्जन 40 फीसदी बढ़ चुका था. नतीजतन 2022 तक वातावरण में नाइट्रस ऑक्साइड की मात्रा 336 अंश प्रति अरब पहुंच गई थी, जो ओद्यौगिक क्रांति के पहले के स्तर से 25 फीसदी ज्यादा है.

मुख्य शोधकर्ता, बोस्टन कॉलेज के हानकिन तियान कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र के जलवायु वैज्ञानिकों की समिति, आईपीसीसी के बताए स्तर से यह मात्रा कहीं ज्यादा है. तियान कहते हैं कि अगर पेरिस समझौते के लक्ष्यों के तहत ग्लोबल वॉर्मिंग रोकने के 2 डिग्री सेल्सियस को हासिल करना है तो नाइट्रस ऑक्साइड के उत्सर्जन को रोकना होगा.

उन्होंने कहा, "नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन कम करना ही एकमात्र समाधान है क्योंकि फिलहाल ऐसी कोई तकनीक उपलब्ध नहीं है जो वातावरण से इस गैस को हटा सके.”

लाफिंग गैस

नाइट्रस ऑक्साइड जिसे लाफिंग गैस भी कहा जाता है, कार्बन डाई ऑक्साइड और मीथेन के अलावा तीसरी प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है, जो इंसानी गतिविधियों से पैदा होती है और जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है. यह मिट्टी, पानी और हवा को भी प्रदूषित करती है. साथ ही यह ओजोन की परत को भी नुकसान पहुंचाती है.

तियान कहते हैं, "अगर हमें जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करना है तो ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में तेजी से कमी कर उन्हें शून्य तक पहुंचाया जाना चाहिए. ऐसे में नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन बढ़ रहा है.”

इस गैस के उत्सर्जन में सबसे बड़ी भूमिका कृषि क्षेत्र की है. रिपोर्ट कहती है कि 2011 से 2020 के दस साल में मानवीय गतिविधियों से निकली नाइट्रस ऑक्साइड कुल उत्सर्जन का तीन चौथाई थी. इसके बाद जीवाश्म ईंधन, कूड़ा, गंदा पानी और बायोमास जलाने जैसे स्रोत हैं.

1980 से 2020 के बीच नाइट्रस ऑक्साइड के उत्सर्जन में 67 फीसदी की वृद्धि हुई है, जिसका मुख्य स्रोत नाइट्रोजन आधारित खाद और जानवरों से निकलने वाले अपशिष्ट हैं.

चीन और भारत सबसे बड़े उत्सर्जक

एक अन्य शोधकर्ता ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय विज्ञान एजेंसी सीएसआईआरओ की वैज्ञानिक पेप कैनाडेल कहती हैं कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने के लिए नियम हैं लेकिन नाइट्रस ऑक्साइड पर लगभग किसी तरह की निगरानी नहीं है.

उन्होंने कहा, "नाइट्रस ऑक्साइड के खिलाफ हमें और ज्यादा आक्रामक होना होगा. कहीं भी किसी तरह की नीति नहीं है और कोशिशें बहुत कम हैं.”

संयुक्त राष्ट्र की समिति आईपीसीसी का अनुमान है कि कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 6.4 फीसदी नाइट्रस ऑक्साइड है और आने वाले सालों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है. लेकिन सदी के आखिर तक अगर पृथ्वी के तापमान को औसतन 2 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ने से रोकना है तो 2050 तक इस गैस के उत्सर्जन में 20 फीसदी की गिरावट जरूरी है.

रिपोर्ट के मुताबिक चीन, भारत, अमेरिका, ब्राजील, रूस, पाकिस्तान, ऑस्ट्रेलिया और कनाडा इस गैस के सबसे बड़े उत्सर्जक हैं. इसकी वजह इन देशों की तेजी से बढ़ती आबादी और खाद्य क्षेत्र पर बढ़ता दबाव है.

यूरोप कभी नाइट्रस ऑक्साइड का सबसे बड़ा उत्सर्जक हुआ करता था लेकिन जीवाश्म ईंधनों पर लगाम लगाकर उसने उत्सर्जन कम किया है. कृषि आधारित गतिविधियों से उसके उत्सर्जन में भी कमी आई है. जापान और दक्षिण कोरिया में भी नाइट्रस ऑक्साइड का उत्सर्जन कम हुआ है.

वीके/एए (एएफपी)

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