देश की खबरें | एनजीटी ने भूजल निकासी को लेकर अधिसूचना रद्द करने के अनुरोध वाली अर्जी पर केंद्र को नोटिस जारी किया
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नयी दिल्ली, 13 अक्टूबर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने मंगलवार को उस अर्जी पर केंद्र और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को नोटिस जारी किया जिसमें भूजल निकासी को लेकर एक अधिसूचना को इस आधार पर रद्द करने का अनुरोध किया गया था कि इसके वाणिज्यिक उपयोग से नदियों का प्रवाह और देश में पेयजल की उपलब्धता प्रतिकूल रूप से प्रभावित हो रही है।
एनजीटी अध्यक्ष न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल के नेतृत्व वाली एक पीठ ने कहा कि केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (सीजीडब्ल्यूए) बार-बार अधिसूचना जारी करके पानी की कमी वाले क्षेत्रों में भूजल निकासी में रियायत दे रहा है जबकि कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है। यह उस उद्देश्य के बिल्कुल विपरीत है, जिसके लिए इसकी स्थापना की गई थी।
इसमें कहा गया है कि विशेषज्ञ अध्ययन के आधार पर जो इस अधिकरण द्वारा तय किया गया था उसके तहत उल्लंघन की रोकथाम के लिए पर्याप्त क्षतिपूर्ति की वसूली के लिए कोई प्रभावी तंत्र नहीं है।
पीठ ने कहा, ‘‘हमने पाया कि आदेश एनजीटी अधिनियम, 2010 की धारा 16 (जी) के तहत वैधानिक रूप से अपील योग्य है। इसलिए, आवेदन की जगह आवेदक के लिये उचित समाधान अपील है। हम अर्जी को अपील में रूपांतरित करने का निर्देश देते हैं।’’
पीठ ने कहा, ‘‘रजिस्ट्री तदनुसार मामले को एक अपील के तौर पर रजिस्टर कर सकती है। हमारा मानना है कि इसमें कुछ मुद्दे हैं जिस पर विचार किये जाने की जरूरत है। अपील विचारार्थ स्वीकार की जाती है। जल शक्ति मंत्रालय को नोटिस जारी किया जाए।’’
अधिकरण ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) को भी नोटिस जारी किया और कहा कि पानी एक दुर्लभ संसाधन है जिस पर जीवन निर्भर है और इसकी निकासी का उचित विनियमन होना चाहिए।
अधिकरण ने कहा कि जिन क्षेत्रों में पानी की कमी है, वहां पुनर्भरण सुनिश्चित करने की कड़ी शर्तों पर निकासी की अनुमति दी जा सकती है।
पीठ ने कहा, ‘‘अपीलकर्ता पूरे कागजात के साथ नोटिस दे सकता है और एक सप्ताह के भीतर तामील को लेकर हलफनामा दाखिल कर सकता है। जवाब छह सप्ताह के भीतर दायर किया जा सकता है।’’
अधिकरण पर्यावरणविद् देवी दास खत्री की ओर से दायर एक अर्जी पर सुनवायी कर रहा था जो उन्होंने सीजीडब्ल्यूए की ओर से जारी अधिसूचना को चुनौती देते हुए दायर की थी। सीजीडब्ल्यूए ने पर्यावरण (संरक्षण) कानून, 1986 की धारा पांच और धारा 3 (3) के तहत देश में भूजल निकासी को नियंत्रित एवं विनियमित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किये थे।
अर्जी में कहा गया था कि पानी की कमी वाले क्षेत्रों में वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए जल निकासी ‘सतत विकास’ के सिद्धांत के खिलाफ है।
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