नयी दिल्ली, 13 जनवरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को एक परियोजना की घोषणा की जिसके तहत भारत विकासशील देशों को प्राकृतिक आपदाओं या मानवीय संकट की स्थिति में आवश्यक चिकित्सा आपूर्ति करेगा। मोदी ने इसके साथ ही इन देशों के लिए विकास समाधान की सुविधा के लिए 'उत्कृष्टता केंद्र' स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।
‘वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ’ डिजिटल सम्मेलन के समापन सत्र को संबोधित करते हुए मोदी ने यह भी कहा कि भारत अन्य विकासशील देशों के साथ अपनी विशेषज्ञता साझा करने के लिए एक 'विज्ञान और प्रौद्योगिकी पहल' शुरू करेगा।
उन्होंने घोषणा की है कि भारत देश में उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए विकासशील देशों के छात्रों के लिए नयी छात्रवृत्ति की शुरुआत करेगी और देशों के विदेश मंत्रालयों के युवा अधिकारियों को जोड़ने के लिए एक नया मंच तैयार करेगा।
मोदी ने कहा, ‘‘मैं अब एक नयी 'आरोग्य मैत्री' परियोजना की घोषणा करना चाहता हूं। इस परियोजना के तहत, भारत प्राकृतिक आपदाओं या मानवीय संकट से प्रभावित किसी भी विकासशील देश को आवश्यक चिकित्सा सामग्री की आपूर्ति करेगा।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हमारी कूटनीतिक आवाज की सक्रियता के लिए, मैं विदेश मंत्रालयों के हमारे युवा अधिकारियों को जोड़ने के लिए 'ग्लोबल-साउथ यंग डिप्लोमैट्स फोरम' का प्रस्ताव करता हूं। भारत विकासशील देशों के छात्रों के लिए भारत में उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए 'ग्लोबल-साउथ स्कॉलरशिप' भी शुरू करेगा।’’
मोदी ने कहा कि विकास साझेदारी के प्रति भारत का दृष्टिकोण परामर्शी, परिणाम उन्मुख, मांग संचालित, जन-केंद्रित और भागीदार देशों की संप्रभुता का सम्मान करने वाला रहा है। उन्होंने कहा ‘‘मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत 'ग्लोबल-साउथ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' स्थापित करेगा। यह संस्थान हमारे किसी भी देश के विकास समाधानों या सर्वोत्तम प्रथाओं पर शोध करेगा, जिसे ग्लोबल साउथ के अन्य सदस्यों में बढ़ाया और लागू किया जा सकता है।’’
मोदी ने कहा कि भारत ने अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भी काफी प्रगति की है। उन्होंने कहा, "हम अन्य विकासशील देशों के साथ अपनी विशेषज्ञता साझा करने के लिए 'वैश्विक-दक्षिण विज्ञान और प्रौद्योगिकी पहल' शुरू करेंगे।"
मोदी ने कोविड की चुनौतियों, ईंधन, उर्वरक, खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों पर प्रकाश डाला और कहा कि इसने विकासशील देशों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है।
उन्होंने कहा, ‘‘पिछले तीन साल कठिन रहे हैं, खासकर हमारे विकासशील देशों के लिए। कोविड महामारी की चुनौतियों, ईंधन, उर्वरक और खाद्यान्न की बढ़ती कीमतों और बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने हमारे विकास के प्रयासों को प्रभावित किया है।" उन्होंने कहा, ‘‘हालांकि, एक नये साल की शुरुआत नयी आशा का समय है।’’
भारत के वैश्विक दृष्टिकोण को सूचीबद्ध करते हुए, उन्होंने कहा कि भारत का दर्शन ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का रहा है और विकासशील देश ऐसे वैश्वीकरण की इच्छा नहीं रखते हैं जो जलवायु संकट या कर्ज संकट सृजित करता हो।
उन्होंने कहा, ‘‘ हम सभी वैश्वीकरण के सिद्धांत की सराहना करते हैं। भारतीय दर्शन हमेशा दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने का रहा है। हालांकि विकासशील देश ऐसे वैश्वीकरण की इच्छा नहीं रखते हैं जो जलवायु संकट या कर्ज संकट सृजित करता हो।’’
मोदी ने कहा, ‘‘ हम एक ऐसा वैश्वीकरण चाहते हैं, जहां टीकों का असमान वितरण नहीं हो या अत्यधिक केंद्रित वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला नहीं हो। हम ऐसा वैश्वीकरण चाहते हैं जो समृद्धि लाए और सम्पूर्ण मानवता की भलाई करे।’’
उन्होंने कहा कि हम विकासशील देश अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के बढ़ते विखंडन को लेकर भी चिंतित हैं और ये भू राजनीतिक तनाव हमें हमारी प्राथमिकताओं से भटकाने का काम करते हैं।
प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके कारण ईंधन, खाद्य और अन्य उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तीव्र वृद्धि हुई है।
उन्होंने कहा कि इस तरह के भू राजनीतिक विखंडन से निपटने के लिये हमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में बुनियादी सुधार की तत्काल जरूरत है।
उन्होंने कहा, ‘‘ हमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित अंतरराष्ट्रीय निकायों के बुनियादी सुधार की तत्काल आवश्यकता है। ये सुधार विकासशील विश्व की चिंताओं को संबोधित करने पर ध्यान केंद्रित करने वाले होने चाहिए और 21वीं सदी की वास्तविकातों को परिलक्षित करते हों।’’
उन्होंने कहा, "भारत की जी20 अध्यक्षता इन महत्वपूर्ण मुद्दों पर वैश्विक दक्षिण के विचारों को आवाज देने का प्रयास करेगी।"
मोदी ने कहा कि शिखर सम्मेलन में 120 से अधिक विकासशील देशों की भागीदारी देखी गई है।
सत्र में अपने समापन संबोधन में, मोदी ने कहा कि सभी विकासशील देश दक्षिण-दक्षिण सहयोग के महत्व और वैश्विक एजेंडे को सामूहिक रूप से आकार देने पर सहमत हैं। उन्होंने कहा कि विकासशील देश सम्पर्क आधारभूत ढांचे में निवेश के महत्व और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने की आवश्यकता पर सहमत हैं।
उन्होंने कहा कि विकासशील देश इस विश्वास में एकजुट हैं कि विकसित दुनिया ने जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी पर अपने दायित्वों को पूरा नहीं किया है।
भारत ने वैश्विक दक्षिण के देशों को एक साथ लाने और यूक्रेन संघर्ष से उत्पन्न खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा सहित विभिन्न वैश्विक चुनौतियों से संबंधित अपनी आम चिंताओं को साझा करने के लिए एक साझा मंच प्रदान करने के लिए दो दिवसीय शिखर सम्मेलन की मेजबानी की।
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