देश की खबरें | मधु कांकरिया : आम आदमी के सरोकार से जुड़ी संवेदनशील लेखिका

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on India at LatestLY हिन्दी. मधु कांकरिया का नाम हिंदी साहित्य में कोमल भावनाओं वाली एक ऐसी संवेदनशील लेखिका के रूप में लिया जाता है, जिनकी कलम समाज के वंचित और दबे-कुचले वर्ग के साथ-साथ हर उस व्यक्ति को छूती है, जिसने लाख दुष्वारियों के बावजूद अपने हिस्से की हवाओं को मुट्ठी में बंद करने की जिद अभी छोड़ी नहीं है।

नयी दिल्ली, छह मार्च मधु कांकरिया का नाम हिंदी साहित्य में कोमल भावनाओं वाली एक ऐसी संवेदनशील लेखिका के रूप में लिया जाता है, जिनकी कलम समाज के वंचित और दबे-कुचले वर्ग के साथ-साथ हर उस व्यक्ति को छूती है, जिसने लाख दुष्वारियों के बावजूद अपने हिस्से की हवाओं को मुट्ठी में बंद करने की जिद अभी छोड़ी नहीं है।

हाल ही में उनके उपन्यास ‘हम कहां थे’ को वर्ष 2021 के बिहारी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। झारखंड के आदिवासियों के संघर्ष पर आधारित यह रचना वर्ष 2018 में प्रकाशित हुई थी। उनकी कई अन्य रचनाओं में भी आदिवासियों से जुड़े कई पहलुओं की झलक मिलती है। मधु अपनी सटीक लेखनी से कई मौकों पर हकीकत की कड़वी सच्चाइयों को इतने करीब से छूती हैं कि पढ़ने वाला भी उसके कसैलेपन को उसी शिद्दत से महसूस कर पाता है।

कोलकाता से जुड़े होने के कारण उनके लेखन में एक संवेदनशीलता और मिठास है। यही वजह है कि विषय कितना भी खुरदरा हो, उनके शब्दों में जीवन की मुलायमियत और धड़कन सुनाई देती है। यह उनका जीवन को बहुत निकट से देखने का हुनर ही तो है जो सेक्सवर्कर्स, रेडलाइट एरिया के नशेड़ियों,, आतंकवाद में कोख उजड़ने से बिलखती मांओं, सैनिकों के जीवन के संघर्ष और पॉलीथिन के बोझ से दबी धरती का दर्द वह बखूबी बयां कर पाती हैं।

उनकी प्रमुख प्रकाशित रचनाओं में उपन्यास-‘खुले गगन के लाल सितारे’ (2000), ‘सलाम आख़री’ (2002), ‘पत्ताखोर’ (2005), ‘सेज पर संस्कृत’ (2008), ‘सूखते चिनार’ (2012); कहानी-संग्रह-‘बीतते हुए’ (2004), ‘और अन्त में यीशु’ (2008), ‘चिड़िया ऐसे मरती है’ (2011), ‘भरी दोपहरी के अँधेरे’ (प्रतिनिधि कहानियाँ); ‘दस प्रतिनिधि कहानियाँ’ (2013), ‘युद्ध और बुद्ध’ (2014); सामाजिक विमर्श-‘अपनी धरती अपने लोग’ (2012); यात्रा-वृत्तान्त-‘बादलों में बारूद’ (2014) शामिल हैं।

मधु कांकरिया का जन्म 23 मार्च 1957 को कोलकाता में रहनेवाले एक मध्यमवर्गीय राजस्थानी परिवार में हुआ था। पिता ध्यानचंद वर्डिया का मैटल का कारोबार था। बचपन से ही पढ़ने-लिखने का शौक होने के कारण वह बहुत छोटी उम्र में ही अपने आसपास की दुनिया को समझने लगी थीं। सामाजिक बुराइयां उन्हें अकसर उद्वेलित किया करती थीं और इस बारे में वह प्राय: अपनी मां अक्षय देवी से उलझ जाती थीं। समाज का यही रूढ़िवादी चेहरा बार-बार उनकी लेखनी में नजर आता है और वह कई मौकों पर समाज को आइना दिखाती हैं।

उनकी शिक्षा की बात करें तो उन्होंने अर्थशास्त्र में एम.ए. किया और कम्प्यूटर विज्ञान में डिप्लोमा भी हासिल किया।

बिहारी सम्मान से पहले उन्हें ‘कथाक्रम पुरस्कार’ (2008), ‘हेमचन्द्र स्मृति साहित्य सम्मान’ (2009), ‘समाज गौरव सम्मान’ (2009), ‘विजय वर्मा कथा सम्मान’ (2012), ‘शिवकुमार मिश्र स्मृति कथा सम्मान’ (2015), ‘प्रथम विद्या साहित्य सम्मान’ (2015) से नवाजा गया।

एकता

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