कोटा (राजस्थान), 10 सितंबर छात्रों द्वारा आत्महत्या जैसा अतिवादी कदम उठाने की बढ़ती घटनाओं के बीच मनोविज्ञान विशेषज्ञों और पुलिस ने रविवार को दावा किया कि आत्महत्याओं के पीछे मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी वजह है।
उन्होंने लोगों से इसका इलाज करवाने वालों को कलंकित/बदनाम नहीं करने की अपील की। कई विशेषज्ञ और आध्यात्मिक गुरू विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर यहां इकट्ठा हुए ।
उन्होंने इस बात पर अपने विचार सामने रखे कि लोगों को उन नकारात्मक सोच से मुक्त कराने का सबसे अच्छा तरीका क्या है जिनके कारण लोग खुद को नुकसान पहुंचाते हैं।
उन्होंने जवाहर नगर के सत्यार्थ ऑडिटोरियम और बूंदी रोड के एक होटल में क्रमश: एलेन करियर इंस्टीट्यूट एंड होप सोसाइटी तथा रोटरी क्लब कोटा राउंडटाउन द्वारा आयोजित दो अलग -अलग कार्यक्रमों में अपने विचार सामने रखे।
कोटा पुलिस रेंज के महानिरीक्षक प्रसन कुमार खामसेरा ने सत्यार्थ ऑडिटोरियम में कहा कि मानसिक स्वास्थ्य ज्यादातर बीमारियों की जड़ है लेकिन इस दृष्टिकोण को हतोत्साहित करने की जरूरत है कि जो व्यक्ति मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेता है, उसके साथ कुछ न कुछ गड़बड़ है।
इहबास (मानव व्यवहार और संबद्ध विज्ञान संस्थान) के पूर्व निदेशक निमेश देसाई ने कहा कि समाज में आत्महत्या के दो तिहाई मामलों का संबंध मनोवैज्ञानिक रोगों से पाया गया है।
उन्होंने कहा कि जो मूलभूत बात समझने की है वह यह है कि कोई व्यक्ति खुदकुशी नहीं करता है बल्कि वह उसका शिकार हो जाता है।
आध्यात्मिक गुरू साधवे सरस्वती ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अचानक आत्महत्या नहीं करता है बल्कि वह कालावधि में अपने अंदर नकारात्मक सोच को बढ़ने देता है। उन्होंने कहा, ‘‘ आध्यात्मिक जीवनशैली से ऐसी सोच को विस्फोटक रूप लेने से रोका जा सकता है।’’
मनोविज्ञानी और होप सोसाइटी के संस्थापक डॉ. एम एल अग्रवाल ने कहा कि पिछले कुछ सालों में आत्महत्या के ज्यादातर मामले नीट अभ्यर्थियों में देखे गये हैं । उन्होंने मांग की कि दबाव को कुछ कम करने के लिए जी की तर्ज पर नीट की परीक्षा साल में दो बार करायी जाए।
वर्ष 2023 में अब तक यहां 22 विद्यार्थियों ने खुदकुशी की है।
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