देश की खबरें | केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना ‘राजनीति से प्रेरित’, इसे कभी मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए थी: विशेषज्ञ

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नयी दिल्ली, 21 फरवरी पर्यावरणविदों और नीति विशेषज्ञों ने दावा किया है कि विरोध के बावजूद केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना को आगे बढ़ाने का सरकार का निर्णय ‘‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’’ है और इसे शुरू में ही मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए थी।

दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकृत 44,605 ​​करोड़ रुपये की लागत वाली और दिसंबर 2024 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा शुरू की गई इस परियोजना का उद्देश्य यमुना की दोनों सहायक नदियों केन और बेतवा को जोड़ना है ताकि सूखाग्रस्त बुंदेलखंड क्षेत्र को पानी की आपूर्ति की जा सके, जिसमें मध्य प्रदेश के नौ और उत्तर प्रदेश के चार जिले शामिल हैं।

केंद्र के अनुसार, इस परियोजना से 10.62 लाख हेक्टेयर भूमि (मध्य प्रदेश में 8.11 लाख हेक्टेयर और उत्तर प्रदेश में 2.51 लाख हेक्टेयर) की सिंचाई होने, लगभग 62 लाख लोगों को पीने का पानी उपलब्ध होने और 103 मेगावाट जलविद्युत एवं 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पन्न होने की उम्मीद है।

सरकारी अनुमान बताते हैं कि परियोजना के कारण 6,600 परिवार विस्थापित होंगे और लगभग 45 लाख पेड़ काटे जाएंगे।

‘नदी जोड़ो परियोजना का आकलन’ विषय पर आयोजित परिचर्चा में जल विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर ने कहा कि इस परियोजना को बुंदेलखंड की जल समस्या के समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन इसकी ‘‘विस्तृत परियोजना रिपोर्ट कहती है कि इस परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य ऊपरी बेतवा क्षेत्र को जल उपलब्ध कराना है, जो बुंदेलखंड का हिस्सा नहीं है।’’

उन्होंने दावा किया, ‘‘वास्तव में यह परियोजना बुंदेलखंड से पानी भेजने को सुगम बना रही है।’’

‘साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपुल’ (एसएएनडीआरपी) के समन्वयक ठक्कर ने कहा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा अधिकृत केंद्र की अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) ने परियोजना पर एक आलोचनात्मक रिपोर्ट दी थी, लेकिन इसे नजरअंदाज कर दिया गया।

उन्होंने कहा, ‘‘मई 2017 में, (पर्यावरण मंत्रालय की) वन सलाहकार समिति ने एक बैठक के विवरण में लिखा था कि ‘आदर्श रूप से, इस परियोजना को मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए’।’’

ठक्कर ने याद किया कि जून 2016 में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री उमा भारती ने परियोजना को मंजूरी न मिलने पर ‘‘हड़ताल पर जाने की धमकी’’ दी थी।

जल संसाधन मंत्रालय के तत्कालीन सचिव शशि शेखर ने कहा कि क्षेत्र का जल विज्ञान ‘‘इस स्तर की परियोजना को उचित नहीं ठहराता।’’

यह पूछे जाने पर कि कई चिंताओं के बावजूद परियोजना को कैसे मंजूरी दी गई, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सेवानिवृत्त अधिकारी ने कहा, ‘‘इसे आंकड़ों में हेराफेरी करके उचित ठहराया गया है.... अगर आप सही आंकड़े, जमीनी हकीकत और पारिस्थितिक कारकों पर विचार करते हैं, तो यह परियोजना आगे नहीं बढ़नी चाहिए थी।’’

मध्य प्रदेश के पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक जसबीर सिंह चौहान ने कहा कि विशेषज्ञों ने इस परियोजना के खिलाफ चेतावनी दी थी, फिर भी सरकार ने इसे आगे बढ़ाया।

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