देश की खबरें | वाम और दक्षिण के बीच की खाई को पाटने पर बहस के साथ जेएलएफ संपन्न

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जयपुर, 23 जनवरी गुलाबी नगरी जयपुर के आसमान पर छाए बादलों के साथ सोमवार को यहां जयपुर साहित्य महोत्सव जोरदार बहस के साथ संपन्न हुआ जहां भारतीय लेखकों, विचारकों, वामपंथी और दक्षिणपंथी नेताओं ने वैचारिक विभाजन पर बहस की।

‘सबसे बड़े साहित्य उत्सवों में से एक’ जेएलएफ का 16वां संस्करण राज्यसभा सांसद जवाहर सिरकार, साहित्यकार, इतिहासकार पुरुषोत्तम अग्रवाल और विद्वान-कार्यकर्ता वंदना शिवा के इस विषय के पक्ष में बोलने के साथ समाप्त हुआ कि 'वामपंथी और दक्षिणपंथी विभाजन को कभी पाटा नहीं जा सकता'।

बहस के दूसरे पक्ष में पूर्व राजनयिक और विधायक पवन के वर्मा, राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी और उपन्यासकार मकरंद आर आर परांजपे थे, जिन्होंने अनिवार्य रूप से तर्क दिया कि वैचारिक विभाजन पर एक पुल बनाया जा सकता है।

स्तंभकार वीर सांघवी द्वारा संचालित बहस की शुरुआत करते हुए सिरकार ने कहा कि 1789 में फ्रांस में बैस्टिल का किला ढहने के बाद, वामपंथी और दक्षिणपंथी शब्द उन लोगों के आधार पर गढ़े गए थे जो राजशाही के खिलाफ थे और दूसरे जो राजशाही व्यवस्था को बनाए रखना चाहते थे।

उन्होंने कहा, ‘‘जैसे-जैसे समय बीतता गया, दक्षिणपंथी शब्द ने अपने स्वयं के बनावटी और धोखाधड़ी के इतिहास को फिर से परिभाषित करते हुए, नायकों और देवताओं की कल्पना करते हुए रूढ़िवाद का दामन थाम लिया और यही इसकी विशेषताएं बन गईं। यह न केवल भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में हुआ।’’

सिरकार ने तर्क दिया कि वामपंथी और दक्षिणपंथी का मतलब प्रगतिशील और प्रतिगामी है, और ‘‘उत्तर और दक्षिण की तरह इनके बीच की खाई को कभी पाटा नहीं जा सकता।’’

सिरकार के पक्ष में अग्रवाल ने तर्क दिया कि ये शब्द इतिहास के एक निश्चित बिंदु पर दिए गए थे लेकिन प्रवृत्ति और घटनाएं उससे बहुत पहले मौजूद थीं। उन्होंने कहा, ‘‘यह मौलिक विश्व विचारों के बीच एक सतत संघर्ष है।’’

शिवा ने कहा कि दोनों पक्ष मिल नहीं सकते क्योंकि वे ‘‘पूरी तरह से अलग मापदंडों पर संगठित हैं।’’

उन्होंने तर्क दिया, ‘‘सांस्कृतिक वर्चस्व और सांस्कृतिक श्रेष्ठता के मुद्दे पर दक्षिणपंथी संगठित हैं, लेकिन वामपंथी समानता, न्याय और आर्थिक क्षेत्रों के आसपास संगठित हैं। दो क्षेत्र अतुलनीय हैं, वे तब तक नहीं मिल सकते जब तक आप शर्तों या मापदंडों को नहीं बदलते।’’

अंतर को पाटने के समर्थक वर्मा, परांजपे और चतुर्वेदी ने तर्क दिया कि विचारधारा एक ‘पश्चिमी रचना’ और दोनों पक्षों को एक प्रगतिशील और एकजुट भारत के लिए मिलकर काम करना चाहिए।

वर्मा ने कहा,‘‘भारत में, हम सभ्यतागत एकता में विश्वास करते हैं। हम असहमत हो सकते हैं, लेकिन हम सहमत हैं कि न केवल राष्ट्रीयता में बल्कि सभ्यता में भी एक आवश्यक एकता है।’’

उन्होंने साथ ही कहा कि यह प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे जिन्होंने अपने वैचारिक मतभेदों से परे जाकर आरएसएस को 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया।

वर्मा ने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने राष्ट्रवादी नेता वी डी सावरकर के विचारों से असहमत होने के बावजूद उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया।

भूटान में पूर्व राजदूत रहे वर्मा ने कहा, ‘‘वामपंथी दक्षिणपंथ से सीखेंगे, दक्षिणपंथी वामपंथ से सीखेंगे। हम दोनों को सुधारने की कोशिश करेंगे और एक महान भारत के लिए काम करेंगे।’’

इस बीच, शिवसेना नेता चतुर्वेदी ने कहा कि वामपंथी और दक्षिणपंथी विचार भारतीय शासन मॉडल पर लागू नहीं होते हैं। ‘भारत का अपना निर्माण है।’

जेएलएफ में इतिहास, राजनीति और विचारधाराओं के शब्दार्थ पर व्यापक बहस हुई क्योंकि दोनों पक्षों ने विभाजन, 1984 के दिल्ली दंगों और गुजरात में 2002 के गोधरा दंगों सहित कई ऐतिहासिक घटनाओं पर तर्क दिया।

जेएलएफ के निर्माता संजॉय के रॉय ने भी बहस को समाप्त करते हुए कहा कि दो विचारधाराओं के बीच हमेशा एक विभाजन रहेगा।

पांच दिनों के इस साहित्यिक महाकुंभ में इतिहास से लेकर राजनीति, संस्कृति, सिनेमा, कविता, धर्म और विज्ञान तक के विषयों पर शानदार और रोमांचक चर्चाएं हुईं।

इस महोत्सव ने साहित्य विजेता अब्दुलरज़ाक गुरनाह, बुकर पुरस्कार विजेता बर्नार्डिन एवरिस्टो, मार्लन जेम्स, शेहान करुणातिलका, और अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार विजेता गीतांजलि श्री समेत करीब 250 वक्ताओं की मेजबानी की।

साहित्यिक कार्यक्रमों में जावेद अख्तर, गुलज़ार, सुधा मूर्ति, अमीश त्रिपाठी, शशि थरूर, अनामिका और मुकुलिका बनर्जी सहित भारतीय लेखकों और कवियों की भी भागीदारी देखी गई।

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