जरुरी जानकारी | श्रमिकों की कमी के कारण निर्यात आर्डर पूरा नहीं कर पा रहे आभूषण विनिर्माता

Get Latest हिन्दी समाचार, Breaking News on Information at LatestLY हिन्दी. रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) ने बुधवार को कहा कि कुशल कार्यबलों के अभाव में रत्न एवं आभूषण उद्योग चुनौतियों का सामना कर रहा है और मांग होने के बावजूद उसे पूरा करने में असमर्थ है।

मुंबई, पांच अगस्त रत्न एवं आभूषण निर्यात संवर्धन परिषद (जीजेईपीसी) ने बुधवार को कहा कि कुशल कार्यबलों के अभाव में रत्न एवं आभूषण उद्योग चुनौतियों का सामना कर रहा है और मांग होने के बावजूद उसे पूरा करने में असमर्थ है।

परिषद के अनुसार एक तरफ जहां निर्यात आर्डर बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कुशल कामगारों की कमी है। कामगार या तो परिवहन संबंधी बाधाओं के कारण आने में असमर्थ हैं या फिर संकट के समय में अपने परिवार को छोड़ना नहीं चाह रहे।

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जीजेईपीसी के चेयरमैन कोलिन शाह ने कहा, ‘‘हालाकि यह समय कठिन है लेकिन आभूषण निर्यात के लिये मांग बढ़ रही है और यह काफी सकारात्मक है। इसी प्रकार, देश में अन्य क्षेत्रों की तरह आभूषण उद्योग से भी ‘लॉकडाउन’ के बीच बड़ी संख्या में श्रमिक पलायन किये।’’

उन्होंने कहा, ‘‘निर्यातकों को अपने कर्मचारियों को आश्वस्त करने की जरूरत है कि कारखानों में कर्मचारी पूरी तरह से सुरक्षित होंगे। आज काम ज्यादा है लेकिन कार्यबल नहीं है। यह अजीब स्थिति है...।’’

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फिलहाल सरकारी आदेश के अनुसार केवल 25 प्रतिशत कर्मचारियों को ही एक बार में काम करने की अनुमति है।

शाह ने कहा कि आभूषण उद्योग में ज्यादातर कुशल कारीगर परंपरागत रूप से पश्चिम बंगाल, गुजरात और उत्तर प्रदेश के हैं। वे सब महामारी के दौरान मुंबई से अपने घरों को चले गये।

श्री रामकृष्ण एक्सपोट्र्स के प्रबंध निदेशक राहुल ढोलकिया ने कहा, ‘‘ कंपनी केवल एक पाली में काम कर पा रही है। उनके उत्पादों की खासकर अमेरिका और चीन के साथ अन्य देशों से अच्छी मांग है लेकिन हम 50 प्रतिशत मांग को भी पूरा नहीं कर सकते क्योंकि कर्मचारियों की संख्या कम होने से उत्पादन केवल 25 प्रतिशत है।’’

उन्होंने कहा कि सीमा शुल्क विभाग में भी कर्मचारियों की संख्या कम होने से खेप धीमी गति से रवाना हो पा रही है।

ढोलकिया ने कहा, ‘‘हमारी कंपनी के मुंबई और सूरत के सभी कर्मचारियों को मार्च में घोषित लॉकडाउन के समय से ही पूरा भुगतान किया गया। जो कर्मचारी काम पर आने में नाकाम रहे, उन्हें मासिक आधार पर इतना पैसा दिया गया जिससे वे घर चला सके। दुर्भाग्य से दुनिया महामारी की चपेट में है और ऐसे में कर्मचारियों पर काम के लिये दबाव देना उचित नहीं जान पड़ता है।’’

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