वोलोंगोंग (ऑस्ट्रेलिया), दो जून (द कन्वरसेशन) आपने ऐसे कई दिल को छू लेने वाले वीडियो देखे होंगे जिसमें माता-पिता या देखभाल करने वाले लोग छोटे बच्चों के साथ किसी भी विषय पर लंबी ‘‘बातचीत’’ करते हैं। आम तौर पर यह केवल मजेदार गपशप होती है, जिसका कोई विशेष मतलब नहीं होता।
ऐसी बातचीत अक्सर बड़ी प्यारी होती है। यह देखकर बहुत अच्छा लगता है कि बच्चे अपनी मां या देखभाल करने वाले की आवाज सुनकर कैसे खिल उठते हैं या उन्हें अपने हाव-भाव, विशेष तरह की आवाज निकालकर प्रतिक्रिया देते हुए दिखाई देते हैं।
जब हम बच्चों से इस तरह बात करते हैं तो क्या होता है? क्या उनसे उसी लहजे और अंदाज में बात करना बेहतर है जैसे हम अन्य बड़ों से बात करते समय करते हैं। या फिर शिशुओं से धीमी, ऊंची आवाज में, सुर-ताल में बात करना ठीक है?
आइए जानते हैं कि अब तक के शोध से क्या पता चला है?
अपने शिशुओं से बात करना मायने रखता है
जब आप अपने बच्चे से बात करते हैं तो वे अलग अलग तरह की आवाज और गतिविधियों से परिचित होते हैं। सवाल यह है कि क्या बच्चे इन सभी बातों को समझ पाते हैं? वैसे तो, पैदा होने से पहले शिशु गर्भ में ही अपनी मां की आवाज के साथ-साथ गर्भ में सुनी गई अन्य ध्वनियों के बारे में भी अच्छी तरह से जान चुके होते हैं।
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