‘आईआरडीएआई’ यह सुनिश्चित करे कि दिव्यांगों के साथ अनुचित व्यवहार नहीं हो : न्यायालय

दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिव्यांगों से विशेष रूप से ‘उच्च’ स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम और शुल्क पर संज्ञान लेते हुए कहा है कि यह सुनिश्चित करना बीमा क्षेत्र के नियामक भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई)का दायित्व है कि ऐसे लोगों से ‘अनुचित पूर्वाग्रह’ से युक्त व्यवहार न हो.

नयी दिल्ली, 02 सितंबर:  दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिव्यांगों से विशेष रूप से ‘उच्च’ स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम और शुल्क पर संज्ञान लेते हुए कहा है कि यह सुनिश्चित करना बीमा क्षेत्र के नियामक भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई)का दायित्व है कि ऐसे लोगों से ‘अनुचित पूर्वाग्रह’ से युक्त व्यवहार न हो. टेट्राप्लाजिया से पीड़ित एक व्यक्ति द्वारा स्वास्थ्य बीमा कवर के लिए दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति प्रतिभा एम सिंह ने कहा कि “तार्किक समायोजन का सिद्धांत” यह कहता है कि ऐसे व्यक्तियों को समाज और राज्य द्वारा अतिरिक्त सहायता प्रदान की जाए ताकि वे अपना जीवन जीने में सक्षम हो सकें। समान मूल्य और गरिमा, और जीवन के अधिकार में चिकित्सा बीमा सहित स्वास्थ्य देखभाल का लाभ उठाने का अधिकार शामिल है.

अदालत ने कई न्यायिक आदेशों के बाद, चार सरकारी बीमा कंपनियों सहित विभिन्न सामान्य और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों द्वारा दिव्यांगों के लिए शुरू बीमा योजनाओं को रेखांकित किया. न्यायमूर्ति सिंह ने दिव्यांगों के लिए शुरू बीमा उत्पाद को रेखांकित करते हुए कहा कि ये ‘‘सबसे आदर्श नहीं हो सकते हैं’’, लेकिन यह उनके लिए ‘समानता प्राप्त करने की प्रक्रिया में पहला कदम’ हो सकता है जो दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार सहित कानूनों का अहम उद्देश्य है.

अदालत ने आगे कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों (पीडब्ल्यूडी) के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संधि स्पष्ट रूप से उनके सम्मानजनक जीवन जीने और गैर-भेदभावपूर्ण तरीके से व्यवहार किए जाने के अधिकारों को मान्यता देता है, जिसे स्वाभाविक रूप से भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त है. अदालत ने 25 अगस्त को दिए आदेश में कहा, ‘‘दिव्यांगजनों के अधिकारों को मान्यता देते हुए लागू की गई इन अंतरराष्ट्रीय संधियों और कानूनों के बावजूद, जमीनी स्तर पर वास्तविक समानता छद्म बनी हुई है, हालांकि सही दिशा में सकारात्मक प्रयास हो रहे हैं.

यह भी अच्छी तरह से स्थापित है कि जीवन के अधिकार में चिकित्सा बीमा सहित स्वास्थ्य देखभाल का लाभ उठाने का अधिकार शामिल है.’’ अदालत ने कहा, ‘‘बीमा क्षेत्र का नियामक होने के नाते भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) का यह भी दायित्व होगा कि वह यह सुनिश्चित करे कि दिव्यांगजन अनुचित रूप से पूर्वाग्रहित न हों और लॉन्च किए गए उत्पादों की समीक्षा के बाद बीमा कंपनियों को उचित निर्देश दें.’’

आदेश में कहा गया, ‘‘यदि किसी बीमित व्यक्ति को ली जा रही प्रीमियम की राशि संबंधी कोई शिकायत है, तो कानून के अनुसार उपाय उनके लिए उपलब्ध हैं. यदि याचिकाकर्ता चाहे तो उसे संबंधित प्राधिकारी से संपर्क करने की स्वतंत्रता दी गई है.’’निवेश पेशेवर याचिकाकर्ता टेट्राप्लेजिया और छाती के नीचे पक्षाघात के कारण व्हीलचेयर तक सीमित था। उसने 2019 में अदालत का दरवाजा खटखटाया क्योंकि दो बीमा कंपनियों ने उसे कोई भी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी जारी करने से इनकार कर दिया था.

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