नयी दिल्ली, 25 मार्च उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि देश की अर्थव्यवस्था में योगदान दे रहे और रोजगार दे रहे उद्योग को केवल पूर्व में पर्यावरण अनुमति नहीं लेने की तकनीकी अनियमितता के आधार पर बंद करने की जरूरत नहीं है।
न्यायमूर्ति इंदिरा बनर्जी और न्यायमूर्ति एएस बोपन्ना ने कहा कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम-1986 पीछे की तारीख से पर्यावरण अनुमति देने से नहीं रोकता।
न्यायालय ने कहा, ‘‘ उचित मामलों में नियमों, विनियमों, अधिसूचनाओं और/या अर्हता का अनुपालन करने पर और जहां पर परियोजनाएं पर्यावरण नियमों के अनुकूल हो या इनका अनुसरण कराया जा सकता है, हमारे विचार में कार्योत्तर पर्यावरण अनुमति देना अस्वीकार्य नहीं है।’’
पीठ ने कहा, ‘‘ अगर ये परियोजनाएं पर्यावरण नियमों का अनुपालन करती हैं तो अदालत अर्थव्यवस्था और परियोजना में काम कर रहे सैकड़ों कर्मचारियों के या परियोजना पर आश्रित अन्य लोगों के जीविकोपार्जन की रक्षा की जरूरत से अनभिज्ञ नहीं रह सकती।’’
शीर्ष अदालत ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि पर्यावरण अनुमति हासिल करने के लिए जरूरी अर्हता पर कोई समझौता नही हो सकता।
पीठ ने कहा, ‘‘ भविष्य की पीढियों की रक्षा करने और स्थायी विकास सुनिश्चित करने के लिए यह अनिवार्य है कि प्रदूषण कानूनों का सख्ती से अनुपालन किया जाए। किसी भी परिस्थिति में उद्योग जो प्रदूषण फैलाते हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं उन्हें बिना रोकटोक काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’’
शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के फैसले को रद्द करते हुए की। एनजीटी ने हरियाणा के उद्योगों को पूर्व में पर्यावरण अनुमति नहीं लेने के आधार पर बंद करने का आदेश दिया था।
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