भारत और चीन, रूसी तेल ना खरीदें तो क्या होगा

डॉनल्ड ट्रंप, रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को और टाइट करने की कोशिश कर रहे हैं.

प्रतीकात्मक तस्वीर (Photo Credit: Image File)

डॉनल्ड ट्रंप, रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों को और टाइट करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसे में अगर रूसी तेल के व्यापार पर कड़ा कदम उठाया जाता है, तो वैश्विक तेल बाजारों और चीन-भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर इसका कितना असर पड़ेगा?अमेरिका के प्रतिबंधों के बावजूद भारत और चीन अब भी रूसी तेल कंपनियों के साथ कारोबार कर रहे हैं. इसे देखते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने दोनों देशों पर सेकेंडरी प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दे चुके हैं. सेकेंडरी प्रतिबंध का मतलब है, किसी ऐसे देश या कंपनी पर टैरिफ लगाना, जो प्रतिबंधित देश के साथ व्यापार में हो. भारत और चीन ने इस धमकी की कड़ी आलोचना की और साफ किया कि वे अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता से समझौता नहीं करेंगे. चीन ने इसे अमेरिका की "जबरदस्ती और दबाव” करार दिया.

भारत ने पश्चिमी देशों पर आरोप लगाया कि भले ही यूरोपीय संघ ने युद्ध शुरू होने के बाद से रूस पर अपनी निर्भरता काफी कम की हो लेकिन अभी भी वह काफी हद तक रूसी ऊर्जा का आयात कर रहा है.

भारत ने इस ओर भी इशारा किया कि एक समय पर वॉशिंगटन ने खुद रूस से भारत के तेल आयात का समर्थन किया था ताकि वैश्विक तेल कीमतों को स्थिर रखा जा सके. यह आयात, रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद तेजी से बढ़ा. 2021 से 2024 के बीच भारत का रूसी तेल आयात लगभग 19 गुना बढ़कर 0.1 से 1.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन हो गया. वहीं, चीन का आयात भी 50 फीसदी बढ़कर 2.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया.

लिथुआनिया स्थित सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर (सीआरईए) के ऊर्जा विश्लेषक, पेट्रस कटिनस ने डीडब्ल्यू को बताया कि रूस के दूसरे सबसे बड़े तेल खरीददार, भारत ने 2022 से 2024 के बीच अपने ऊर्जा खर्च में कम से कम 33 अरब अमेरिकी डॉलर की बचत की. कटिनस के अनुसार, जब अमेरिका और यूरोप ने रूसी तेल और गैस पर अपनी निर्भरता घटाई, तो मॉस्को ने भारत को काफी सस्ती दरों पर तेल बेचा. सस्ते रेट पर रूसी कच्चे तेल की खरीद का फैसला भारत की पारंपरिक विदेश नीति के अनुरूप था, जिसके तहत वह अमेरिका, रूस और चीन के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखता है और किसी एक को प्राथमिकता नहीं देता. इस पूरे दौर में भारत ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी प्राथमिकता कोई देश नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और किफायती दरें हैं.

ट्रंप की नई पाबंदी धमकियों से तेल बाजार में हलचल

डॉनल्ड ट्रंप ने पहले ही भारतीय आयात पर 25 फीसदी का टैरिफ लगाया हुआ है लेकिन इसके बाद भी नया आदेश जारी किया गया. जिसके तहत अब मौजूद 25 फीसदी के टैरिफ पर 25 फीसदी का अतिरिक्त शुल्क लगाया जाएगा. इस एलान के बाद कच्चे तेल की कीमतें बढ़ गई. भारतीय मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस नए शुल्क के कारण भारत की तेल बिलिंग लगभग 11 अरब डॉलर तक महंगी हो सकती है.

नई दिल्ली ने इस अतिरिक्त शुल्क को "अनुचित, अन्यायपूर्ण और अस्वीकार्य” करार दिया है. ट्रंप ने कहा कि ये टैरिफ 21 दिनों में लागू होंगे, ताकि भारत और रूस को अमेरिकी सरकार के साथ बातचीत का पर्याप्त समय मिल सके.

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका सेकेंडरी टैरिफ भी लगाता है, तो पहले से ही पश्चिमी पाबंदियों से जूझ रही रूसी अर्थव्यवस्था के लिए यह एक और बड़ा झटका हो सकता है. रूस का बजट पहले से ही भारी दबाव में है. उसका रक्षा खर्च कुल जीडीपी के छह फीसदी से भी अधिक बढ़ चुका है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार रूस में महंगाई दर नौ फीसदी तक है लेकिन विश्लेषकों का अनुमान है कि वास्तविक महंगाई दर 15-20 फीसदी तक पहुंच चुकी है.

रूस के साथ तेल व्यापार घटा सकता है भारत

नई पाबंदियां वैश्विक ऊर्जा कीमतों और व्यापार के लिए घातक साबित हो सकती हैं. इसका हाल 2022 जैसा हो सकता है, जब तेल की कीमतें अचानक बढ़ गई थी और रूस ने पश्चिमी प्रतिबंधों से बचने के लिए दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ सस्ते दामों पर ऊर्जा सौदा करना शुरू कर दिया था.

नई दिल्ली स्थित ऊर्जा शोध संस्थान कप्लर की तेल विश्लेषक, सुमित रितोलिया ने डीडब्ल्यू से कहा, "अगर भारत ने 2022 में रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदा होता, तो तेल की कीमत कितनी बढ़ जाती, इसका सिर्फ अंदाजा ही लगाया जा सकता है-100 डॉलर, 120 डॉलर, या शायद 300 डॉलर प्रति बैरल तक भी कीमतें बढ़ सकती थी.” युद्ध से पहले के हफ्तों में कच्चे तेल की कीमत 85 से 92 डॉलर प्रति बैरल के बीच थी.

लेकिन अब ट्रंप के लगाए गए 25 फीसदी सेकेंडरी टैरिफ भारत को मजबूर कर सकते हैं कि वह रूस से अपने तेल व्यापार कम करे. ऐसे में अगर और प्रतिबंध लगाए गए, तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती है. पेट्रस कटिनस का कहना है कि सेकेंडरी प्रतिबंध माहौल को और बिगाड़ सकते हैं. इससे भारतीय कंपनियों की अमेरिकी वित्तीय प्रणाली तक पहुंच खतरे में पड़ सकती है और वैश्विक बाजारों से जुड़े बैंकों, रिफाइनरियों और शिपिंग कंपनियों पर भी गंभीर असर पड़ सकता है.

तेजी से बढ़ सकती हैं तेल की कीमतें

विश्लेषकों का मानना है कि अगर रूस का पांच मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल अचानक से वैश्विक बाजार से हटा दिया जाएगा, तो तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आ सकता है. जिससे प्रभावित देशों को तुरंत वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ेगी. और हाल ही में ओपेक द्वारा की गई उत्पादन वृद्धि भी इतनी बड़ी मात्रा की भरपाई करने के लिए काफी नहीं हो पाएगी क्योंकि उत्पादन क्षमता सीमित है.

सेंटर फॉर यूरोपियन पॉलिसी एनालिसिस के सीनियर फेलो अलेक्जेंडर कोल्यान्दर ने ब्रिटिश अखबार, द इंडिपेंडेंट को बताया, "इस पांच मिलियन बैरल का विकल्प तुरंत ढूंढ पाना असंभव है, इसलिए तेल की कीमतों को बढ़ने से रोकना नामुमकिन हो जाएगा.”

तेल विशेषज्ञ, सुमित रितोलिया ने डीडब्ल्यू से कहा कि अगर भारत को रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करनी पड़ती है, तो इसमें भारतीय कंपनियों को कम से कम एक साल का समय लग सकता है.

तेल की कीमते बढ़ने से बढ़ेगी महंगाई

अगर तेल महंगा होता है, तो इसका असर न सिर्फ अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया में महंगाई के रूप में पड़ेगा. अमेरिकी केंद्रीय बैंक (फेड) का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि से अमेरिका में लगभग 0.2 प्रतिशत महंगाई बढ़ जाती है. भारतीय रिजर्व बैंक का भी यही अनुमान है. अगर मौजूदा कीमत 66 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 110–120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती है, तो महंगाई में लगभग एक प्रतिशत की और बढ़ोतरी हो सकती है. जिससे उपभोक्ताओं और कंपनियों की लागत तेजी से बढ़ेगी, खासकर ऊर्जा, परिवहन और खाद्य क्षेत्र में.

चीन बच निकलेगा, जबकि भारत भुगतेगा?

कटिनस का कहना है कि अमेरिका के साथ चीन का कुल व्यापार भारत की तुलना में चार गुना से भी अधिक है. ऐसे में संभव है कि नई अमेरिकी कार्रवाइयों से चीन को छूट मिल जाए. दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच 580 अरब डॉलर से अधिक का व्यापारिक संबंध है, और अपनी विशाल आर्थिक ताकत के चलते चीन के पास वह मौका हो सकता है, लेकिन भारत के पास यह नहीं है.

इसके अलावा, चीन की "रेयर अर्थ मेटल्स” (दुर्लभ धातुओं) पर पकड़ है, जो लंबे समय से अमेरिका-चीन संबंधों में विवाद का विषय भी रहा है. बीजिंग इसे इस्तेमाल कर ट्रंप के दबाव को सीमित कर सकता है.

जबकि भारत के पास ऐसा कोई प्रभावशाली तरीका नहीं है. यही कारण है कि ट्रंप ने पिछले हफ्ते भारत पर दबाव और बढ़ा दिया और कहा कि रूस और भारत पर लगाई गई उनकी नई पाबंदियां दोनों देशों की "मरी हुई अर्थव्यवस्थाओं को एक साथ गिरा देंगी.”

भारत के रूसी तेल आयात में बढ़ोतरी

भारत को अब रूसी तेल से उतना लाभ नहीं मिल रहा है, जितना 2022 में मिल रहा था. जब प्रति बैरल 15 से 20 डॉलर तक की छूट मिलती थी. विश्लेषक रितोलिया के मुताबिक, यह मार्जिन अब घटकर सिर्फ पांच डॉलर प्रति बैरल ही रह गया है.

रूस अपनी तिजोरी भरने के लिए आक्रामक ढंग से ऊर्जा आय पर जोर दे रहा है. इसमें उसकी मदद बढ़ती मांग कर रही है, खासकर तुर्की से, जो अब उसका तीसरा सबसे बड़ा तेल खरीदार बन चुका है और पूरे एशिया से, जहां रूसी कच्चे तेल पर नया लेबल लगाकर फिर से निर्यात किया जा रहा है, ताकि अमेरिकी पाबंदियों से बचा जा सके.

इसके बावजूद भारतीय रिफाइनरियां रूसी तेल खरीदना जारी रखे हुए हैं. जून में आयात बढ़कर 2.08 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया. और यह भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 44 फीसदी हिस्सा बन गया है.

कौन-सा रास्ता अपनाएंगे भारत और चीन

अनुमान है कि चीन का रुख पहले जैसा ही रहेगा. चीनी बैंक अब धीरे-धीरे रूसी लेन-देन को अस्वीकार कर रहे हैं, जिस कारण मॉस्को को मजबूरी में बिचौलियों और तीसरे देशों का रास्ता अपनाना पड़ रहा है.

बीजिंग के लिए तेल आयात सर्वोच्च प्राथमिकता है और यह आमतौर पर काफी हद तक राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रहता है. वहीं, भारत का रुख कुछ अलग हो सकता है. दबाव पड़ने पर आयात कम किया जा सकता है, लेकिन सस्ते रूसी कच्चे तेल को पूरी तरह छोड़ने की संभावना कम ही है.

सुमित रितोलिया का मानना है कि भारत अपने रूसी तेल आयात को "कम” जरूर कर सकता है, लेकिन उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि यह निकट भविष्य में पूरी तरह शून्य हो सकता है.”

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