देश की खबरें | वर्ष 2024 में राज्यों के 18 प्रतिशत विधेयकों को राज्यपालों की स्वीकृति मिलने में विलंब: रिपोर्ट

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नयी दिल्ली, 15 मई थिंकटैंक ‘पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च’ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2024 में विधेयकों को मंजूरी देने में राज्यपालों द्वारा लिए गए समय में व्यापक अंतर था और राज्यों में लगभग 18 प्रतिशत विधेयकों को अंतिम मंजूरी मिलने में तीन महीने से अधिक का समय लगा।

यह रिपोर्ट उच्चतम न्यायालय के उस फैसले के बाद जारी बहस के बीच आई है जिसमें कहा गया है कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचार के लिए रखे गये विधेयकों पर संदर्भ प्राप्त होने की तारीख से तीन महीने के भीतर निर्णय लेना चाहिए।

पीआरएस की बृहस्पतिवार को जारी राज्य कानूनों की वार्षिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि अरुणाचल प्रदेश, बिहार, दिल्ली, मिजोरम और राजस्थान जैसे राज्यों में सभी विधेयकों को एक महीने के भीतर मंजूरी मिल गई।

सभी राज्यों में 60 प्रतिशत विधेयकों को एक महीने के भीतर राज्यपाल की मंजूरी मिल गई।

पीआरएस की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘2024 में, विभिन्न राज्यों में राज्यपालों द्वारा विधेयकों को मंजूरी देने में लगने वाले समय में व्यापक अंतर था।’’

रिपोर्ट के अनुसार जिन राज्यों में तीन महीने से अधिक समय के बाद विधेयकों का उच्च अनुपात स्वीकृत हुआ, उनमें कांग्रेस शासित राज्य हिमाचल प्रदेश (72 प्रतिशत विधेयक पारित), तृणमूल कांग्रेस शासित पश्चिम बंगाल (38 प्रतिशत), साथ ही सिक्किम (56 प्रतिशत) शामिल हैं। वर्ष 2024 में पारित विधेयकों में से 18 प्रतिशत को तीन महीने से अधिक समय के बाद स्वीकृत किया गया। इनमें अप्रैल, 2025 तक स्वीकृति का इंतजार कर रहे विधेयक शामिल हैं।

तमिलनाडु सरकार ने राज्यपाल के पास लंबित 12 विधेयकों के संबंध में उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, जिन्हें 2020 और 2023 के बीच विधायिका द्वारा पारित किया गया था। अदालत के नोटिस के बाद 2023 में राज्यपाल ने इनमें से 10 विधेयक विधानसभा को लौटा दिए। जब ​​विधानसभा ने इन्हें दोबारा पारित किया तो राज्यपाल ने राष्ट्रपति की राय के लिए विधेयक सुरक्षित रख लिए और तब से ये विधेयक लंबित हैं।

उच्चतम न्यायालय केरल के राज्यपाल की स्वीकृति के लिए लंबित सात विधेयकों से संबंधित याचिका पर भी सुनवाई करने वाला है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ राज्यों में सत्र बुलाने और राज्यपाल के अभिभाषण को लेकर समस्याएं हैं, क्योंकि विधानसभा का सत्र राज्यपाल द्वारा बुलाने से शुरू होता है और राज्यपाल द्वारा सत्रावसान करने पर समाप्त होता है।

पंजाब सरकार ने फरवरी 2023 में उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें कहा गया था कि राज्यपाल बजट सत्र नहीं बुला रहे हैं। अदालत ने कहा कि राज्यपाल राज्य मंत्रिमंडल द्वारा दी गई सलाह से बंधे हैं।

कुछ राज्यों में सत्रावसान नहीं किया गया, जिससे विधानसभा अध्यक्ष को राज्यपाल की मंजूरी के बिना ही सत्र बुलाने का अधिकार मिला। वर्ष 2024 में, दिल्ली, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में बिना किसी सत्रावसान के छह महीने से अधिक समय तक सत्र जारी रहे और सदन की बैठकों के बीच लंबा अंतराल रहा। दिल्ली में फरवरी से दिसंबर 2024 तक सत्र चला।

रिपोर्ट के अनुसार तमिलनाडु में यही सत्र फरवरी से दिसंबर 2024 तक 18 बैठकों के साथ जारी रहा।

पश्चिम बंगाल में जुलाई 2023 में शुरू होने वाले सत्र को मई 2025 तक स्थगित नहीं किया गया है।

तमिलनाडु में फरवरी 2024 में राज्यपाल ने विधानसभा में अपना अभिभाषण पढ़ने से इनकार कर दिया था और सदन से बहिर्गमन कर गए थे। ऐसी ही घटना जनवरी 2025 में भी घटित हुई थी।

उच्चतम न्यायालय ने आठ अप्रैल को तमिलनाडु सरकार द्वारा उठाए गए विधेयकों से निपटते समय राज्यपाल की शक्तियों से संबंधित मामले में फैसला सुनाया था। पहली बार इसमें यह प्रावधान किया गया कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा विचारार्थ सुरक्षित रखे गए विधेयकों पर ऐसा संदर्भ प्राप्त होने की तिथि से तीन माह के भीतर निर्णय लेना चाहिए।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अनुच्छेद 143(1) के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए उच्चतम न्यायालय से यह जानने का प्रयास किया है कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार का इस्तेमाल करने के लिए न्यायिक आदेशों द्वारा समयसीमा निर्धारित की जा सकती है।

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